भारत आज स्वास्थ्य के मोर्चे पर एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जहाँ एक तरफ संक्रामक रोगों का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है, वहीं दूसरी तरफ जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। देश के स्वास्थ्य परिदृश्य में पिछले दो दशकों में बड़ा बदलाव आया है। कभी तपेदिक, मलेरिया, डेंगू, हैजा और अन्य संक्रामक रोग सबसे बड़ी चुनौती माने जाते थे, लेकिन अब मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर और किडनी संबंधी बीमारियाँ भी उतनी ही गंभीर समस्या बन चुकी हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसे ‘डबल डिजीज बर्डन’ अर्थात दोहरे रोग-भार की स्थिति बताते हैं।
बढ़ता गैर-संचारी रोगों का खतरा
भारत में आज गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज) सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरे हैं। मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियाँ देश में होने वाली अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय स्वास्थ्य एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि देश में होने वाली लगभग दो-तिहाई मौतें अब इन्हीं बीमारियों के कारण होती हैं। मधुमेह के मामलों में भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। बदलती जीवनशैली, फास्ट फूड का बढ़ता चलन, शारीरिक श्रम में कमी और तनाव इसके प्रमुख कारण हैं। पहले यह बीमारी अधिक आयु के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब 30 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। उच्च रक्तचाप भी एक ‘साइलेंट किलर’ बन चुका है। लाखों लोगों को यह पता ही नहीं होता कि वे हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं। यही स्थिति बाद में हृदयाघात और ब्रेन स्ट्रोक जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बनती है।
हृदय रोग और कैंसर की बढ़ती चुनौती
देश में हृदय रोग मृत्यु के सबसे बड़े कारणों में शामिल हो चुके हैं। चिंताजनक बात यह है कि पहले जहाँ हार्ट अटैक को वृद्धावस्था की समस्या माना जाता था, वहीं अब 35 से 50 वर्ष की आयु के लोगों में भी इसके मामले बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ इसके लिए तनावपूर्ण जीवन, धूम्रपान, मोटापा, अनियमित खान-पान और व्यायाम की कमी को जिम्मेदार मानते हैं। कैंसर के मामलों में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की जा रही है। महिलाओं में स्तन कैंसर और गर्भाशय ग्रीवा (सर्वाइकल) कैंसर प्रमुख हैं, जबकि पुरुषों में मुख कैंसर, फेफड़ों का कैंसर और तंबाकू से जुड़े अन्य कैंसर अधिक पाए जाते हैं। भारत में बड़ी संख्या में लोग तंबाकू और गुटखे का सेवन करते हैं, जिसके कारण मुख कैंसर के मामले दुनिया के कई देशों की तुलना में अधिक हैं।
संक्रामक रोग अभी भी चुनौती
हालाँकि गैर-संचारी रोग तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन भारत अभी भी संक्रामक रोगों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। तपेदिक (टीबी) आज भी देश के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। भारत दुनिया में टीबी के सबसे अधिक रोगियों वाले देशों में शामिल है। गरीबी, कुपोषण, भीड़भाड़ और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच इसके प्रसार को बढ़ाती है। डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी मच्छरजनित बीमारियाँ हर वर्ष मानसून के दौरान और उसके बाद हजारों लोगों को प्रभावित करती हैं। जलभराव, स्वच्छता की कमी और बदलती जलवायु परिस्थितियाँ इन बीमारियों को बढ़ावा देती हैं। इसी प्रकार मौसमी फ्लू, वायरल बुखार और श्वसन संबंधी संक्रमण भी समय-समय पर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती बनते रहते हैं।
पिछले 10 वर्षों में भारत का स्वास्थ्य परिदृश्य
बीमारी 2015 के आसपास 2024-25 के आसपास स्थिति
टीबी
(प्रति लाख आबादी) 237 187 लगभग 21 प्रतिशत कमी
गैर-संचारी रोगों से मौतें लगभग 62 प्रतिशत 63-65 प्रतिशत लगातार वृद्धि
मधुमेह लगभग 6-7 करोड़ रोगी 10 करोड़ से अधिक तीव्र वृद्धि
उच्च रक्तचाप लगभग 20-25 प्रतिशत वयस्क 30 प्रतिशत से अधिक वयस्क तेज वृद्धि
डेंगू छिटपुट प्रकोप कई राज्यों में स्थायी चुनौती, मामलों में कई गुना वृद्धि
हृदय रोग प्रमुख कारणों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण लगातार वृद्धि
कैंसर लगभग 10-11 लाख वार्षिक मामले
कौन हैं सबसे अधिक प्रभावित?
भारत में स्वास्थ्य समस्याओं का प्रभाव सभी वर्गों पर समान रूप से नहीं पड़ता। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोग गैर-संचारी रोगों की चपेट में सबसे अधिक आ रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों से अधिक प्रभावित हैं क्योंकि उनकी जीवनशैली अपेक्षाकृत कम सक्रिय होती है। महिलाओं में एनीमिया अभी भी एक बड़ी समस्या है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार देश की बड़ी संख्या में महिलाएँ और किशोरियाँ रक्ताल्पता से पीड़ित हैं। इसके अलावा स्तन कैंसर और सर्वाइकल कैंसर भी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बने हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में टीबी, कुपोषण और संक्रामक रोगों का खतरा अपेक्षाकृत अधिक है। स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच और जागरूकता की कमी भी इन समस्याओं को बढ़ाती है।
सरकार के प्रयास
स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई स्तरों पर कार्य कर रही हैं। आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को स्वास्थ्य बीमा सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। देशभर में स्थापित आयुष्मान आरोग्य मंदिर और हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय गैर-संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के तहत मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर और हृदय रोगों की स्क्रीनिंग की जा रही है। 30 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच पर विशेष बल दिया जा रहा है। टीबी उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। निक्षय पोषण योजना के माध्यम से रोगियों को पोषण सहायता भी प्रदान की जा रही है। डेंगू और मलेरिया नियंत्रण के लिए मच्छरनाशी दवाओं का छिड़काव, जागरूकता अभियान और निगरानी तंत्र को मजबूत किया गया है।
क्या हैं आगे की चुनौतियाँ?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल अस्पतालों और दवाओं के भरोसे स्वास्थ्य संकट का समाधान संभव नहीं है। बीमारी होने के बाद उपचार की तुलना में बीमारी को रोकना अधिक प्रभावी और कम खर्चीला उपाय है। भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, प्रदूषण, तनाव, असंतुलित भोजन और शारीरिक निष्क्रियता आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को और बढ़ा सकते हैं। इसके अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी चिंता का विषय है। क्या हैं सुझाव?
विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को वर्ष में कम से कम एक बार स्वास्थ्य जांच अवश्य करानी चाहिए। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना आवश्यक है। तंबाकू और शराब से दूरी बनाकर अनेक गंभीर बीमारियों के जोखिम को कम किया जा सकता है। मच्छरजनित रोगों से बचाव के लिए घर और आसपास स्वच्छता बनाए रखना जरूरी है। बच्चों और महिलाओं में पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना भी अत्यंत आवश्यक है।
भारत का वर्तमान हेल्थ बुलेटिन स्पष्ट संकेत देता है कि देश एक नए स्वास्थ्य संक्रमण काल से गुजर रहा है। जहाँ संक्रामक रोग अब भी चुनौती बने हुए हैं, वहीं जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ती जा रही हैं। सरकार की योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन स्वास्थ्य सुरक्षा केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, परिवार और प्रत्येक नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। यदि जागरूकता, नियमित जांच, संतुलित जीवनशैली और समय पर उपचार को प्राथमिकता दी जाए, तो भारत न केवल बीमारियों का बोझ कम कर सकता है बल्कि एक स्वस्थ और उत्पादक राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ सकता है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
