डिजिटल क्रांति ने हमारे जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। संचार, व्यापार, शिक्षा और मनोरंजन के साथ-साथ मानव संबंधों की प्रकृति भी बदल रही है। इसी परिवर्तन के बीच एक ऐसा विषय भी तेजी से चर्चा में आया है, जिसे कभी समाज के हाशिए का मुद्दा माना जाता था-पुरुष एस्कॉर्ट या जिगोलो नेटवर्क। इंटरनेट, सोशल मीडिया, डेटिंग ऐप्स और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने इस क्षेत्र को पहले की तुलना में अधिक गोपनीय और सुलभ बना दिया है। हालांकि, इसके साथ साइबर ठगी, मानव शोषण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी गंभीर चुनौतियाँ भी जुड़ गई हैं।
सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि भारत में जिगोलो शब्द किसी कानून या सरकारी आँकड़ों की अलग श्रेणी नहीं है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो भी इस नाम से कोई पृथक आँकड़ा प्रकाशित नहीं करता। इसलिए इंटरनेट पर दिखाई देने वाले करोड़ों रुपये के कारोबार या लाखों ग्राहकों जैसे दावों का कोई आधिकारिक आधार उपलब्ध नहीं है।
बदलता सामाजिक परिदृश्य
समाजशास्त्रियों का मानना है कि शहरीकरण, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या, व्यस्त जीवनशैली, आर्थिक स्वतंत्रता और डिजिटल माध्यमों ने व्यक्तिगत संबंधों की प्रकृति को प्रभावित किया है। आज अनेक लोग ऑनलाइन मित्रता और संगति की तलाश करते हैं। इसी वातावरण में कुछ लोग भुगतान आधारित संगति या एस्कॉर्ट सेवाओं की ओर भी आकर्षित होते हैं। यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों में इंटरनेट आधारित एस्कॉर्ट नेटवर्क विकसित हुए हैं।
जिगोलो कौन होता है?
सामान्यतः जिगोलो उस पुरुष को कहा जाता है जो आर्थिक प्रतिफल के बदले किसी ग्राहक को संगति या एस्कॉर्ट सेवा प्रदान करता है। व्यवहार में यह व्यवस्था कई रूपों में दिखाई देती है और हर मामले की प्रकृति अलग हो सकती है। इसलिए सभी मामलों को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
मांग किन वर्गों में?
लोकप्रिय धारणा है कि ऐसी सेवाओं की मांग केवल संपन्न महिलाएँ करती हैं। उपलब्ध शोध इससे अधिक जटिल तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार पुरुष एस्कॉर्ट सेवाओं के ग्राहक महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी हो सकते हैं। भारत में इस विषय पर व्यापक शोध उपलब्ध नहीं है, इसलिए किसी एक वर्ग को प्रमुख ग्राहक बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा। जहाँ महिला ग्राहकों का उल्लेख मिलता है, वहाँ अक्सर निम्न परिस्थितियाँ सामने आती हैं-
1.आर्थिक रूप से स्वतंत्र और अकेली रहने वाली महिलाएँ।
2.तलाकशुदा या अलग रह रही महिलाएँ।
3.कुछ मामलों में वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट महिलाएँ।
4.महानगरों में रहने वाला उच्च आय वर्ग।
फिर भी इन वर्गों की संख्या या अनुपात पर कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।
किन शहरों में अधिक सक्रियता?
मीडिया रिपोर्टों और विभिन्न अध्ययनों में दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता और गोवा जैसे शहरों का उल्लेख अपेक्षाकृत अधिक मिलता है। इसके पीछे बड़ी आबादी, कॉर्पोरेट संस्कृति, पर्यटन और डिजिटल प्लेटफॉर्म का व्यापक उपयोग प्रमुख कारण माने जाते हैं। लेकिन यह दोहराना आवश्यक है कि इन शहरों के लिए भी कोई आधिकारिक सरकारी आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
सबसे बड़ा कारोबार-साइबर ठगी
विशेषज्ञों के अनुसार आज सबसे बड़ी समस्या वास्तविक एस्कॉर्ट नेटवर्क से अधिक जिगोलो जॉब के नाम पर होने वाली ऑनलाइन ठगी है। सोशल मीडिया, फेसबुक, टेलीग्राम, व्हाट्सऐप और वेबसाइटों पर आकर्षक विज्ञापन देकर युवाओं को मोटी कमाई का लालच दिया जाता है। उनसे पहले पंजीकरण शुल्क, सदस्यता शुल्क, सुरक्षा जमा, होटल बुकिंग या प्रोफाइल सत्यापन के नाम पर पैसे जमा कराए जाते हैं। भुगतान के बाद या तो संपर्क समाप्त कर दिया जाता है या बार-बार नए शुल्क की मांग की जाती है। दिल्ली और गुरुग्राम सहित कई मामलों में पुलिस ने ऐसे गिरोहों का पर्दाफाश किया है।
क्यों फँस जाते हैं युवा?
इस प्रश्न का उत्तर केवल आर्थिक नहीं है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि त्वरित धन कमाने की इच्छा, बेरोजगारी, सोशल मीडिया का प्रभाव, अकेलापन और जोखिमों की अनदेखी, ये सभी कारण युवाओं को ऐसे झाँसों की ओर धकेलते हैं। अपराधी इन्हीं कमजोरियों का लाभ उठाते हैं।
कानूनी स्थिति
भारतीय कानून में जिगोलो शब्द की अलग कानूनी परिभाषा नहीं है। लेकिन यदि किसी गतिविधि में मानव तस्करी, दलाली, जबरन शोषण, नाबालिगों का उपयोग, संगठित अपराध या अवैध आर्थिक लाभ शामिल हो, तो विभिन्न कानूनों के अंतर्गत कार्रवाई की जा सकती है। इस कारण यह विषय केवल नैतिक नहीं, बल्कि कानूनी दृष्टि से भी जटिल है।
स्वास्थ्य और सामाजिक प्रभाव
विशेषज्ञ इस पूरे विषय को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा से भी जोड़कर देखते हैं। असुरक्षित यौन व्यवहार, मानसिक तनाव, ब्लैकमेल, साइबर उगाही और मानव तस्करी जैसे जोखिम इससे जुड़े हो सकते हैं। भारत में किए गए एक राष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि वाणिज्यिक यौन सेवाएँ लेने वाले अनेक पुरुष नियमित सुरक्षा उपायों का पालन नहीं करते थे, जिससे संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।
समाज के लिए संदेश
इस विषय पर चर्चा करते समय दो अतियों से बचना चाहिए। पहली, बिना प्रमाण के सनसनीखेज दावे करना। दूसरी, समस्या के अस्तित्व से पूरी तरह इनकार करना। वास्तविकता यह है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ऐसे नेटवर्कों और उनसे जुड़ी ठगी दोनों को नई गति दी है। इसलिए जागरूकता, साइबर साक्षरता, रोजगार के अवसर और मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है।
जिगोलो नेटवर्क का विषय केवल जिज्ञासा या मनोरंजन का नहीं है। यह बदलते सामाजिक ढाँचे, डिजिटल अपराध, मानव संबंधों, कानून और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। भारत में इसके बारे में आधिकारिक आँकड़ों का अभाव है, इसलिए किसी भी दावे को सावधानी से परखना चाहिए। साथ ही, युवाओं को यह समझना होगा कि इंटरनेट पर दिखाई देने वाले आसान पैसे के अधिकांश प्रस्ताव धोखाधड़ी भी हो सकते हैं। समाज, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और डिजिटल प्लेटफॉर्म को मिलकर ऐसी ठगी और शोषण पर अंकुश लगाने के लिए अधिक प्रभावी प्रयास करने होंगे।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
