'प्रेमचंद को एक विशेष विचारधारा के आलोचकों ने कभी भी राष्ट्रवादी स्वीकार नहीं किया। भले ही प्रेमचंद प्रत्यक्ष राष्ट्रवादी साहित्य की रचना नहीं कर रहे थे लेकिन उनके साहित्य में प्रच्छन्न राष्ट्रवादी चिंतन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।' ये विचार दिल्ली विश्वविद्यालय के पी.जी.डी.ए.वी.कॉलेज ( सांध्य) के हिन्दी विभाग, अनुभूति (सांस्कृतिक संस्था) तथा राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा साहित्य सम्राट प्रेमचंद की 147वीं जयंती पर 'प्रेमचंद का जीवन दर्शन' विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला के अवसर पर डॉ. बी आर अंबेडकर विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर सत्यकेतु सांकृत द्वारा कहे गए। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में राष्ट्रीय चिंतन का स्वर आरंभ से ही रहा है। उनके पहले ही कहानी संग्रह 'सोज़े-वतन' को अंग्रेज सरकार द्वारा ज़ब्त कर लिया गया था। उस संग्रह की अधिकांश कहानियाँ उस औपनिवेशिक सत्ता के विरोध में खड़ी दिखाई देती हैं। प्रो. सांकृत ने इस अवसर पर प्रेमचंद के जीवन के विभिन्न पहलुओं को रचना- पात्रों के माध्यम से बड़ी सरल एवं सहजता के साथ विश्लेषित करते हुए उनके जीवन दर्शन पर प्रकाश डाला।
इस अवसर पर कॉलेज प्राचार्या प्रो.हरिन्द्री चौधरी ने कहा कि 'प्रेमचंद ने साहित्य को साधन के रूप में अपनाकर न केवल समाज को नयी दिशा और दशा दी बल्कि उन्होंने कथा साहित्य को यथार्थवादी रखते हुए भी आदर्शोन्मुख बनाने की प्रेरणा दी।
' कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ आलोचक और कॉलेज के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर प्रो. हरीश अरोड़ा ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं का वास्तविक विश्लेषण करना हो तो उस काल खंड के साथ संबंध करके देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कथाकार अपनी कथा के माध्यम से समाज में एक नया क्रांतिकारी परिवर्तन करता है। यह प्रेमचंद की रचनाओं में बख़ूबी देखा जा सकता है। हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. ओंकार लाल मीणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि प्रेमचंद का जीवन दर्शन मानवतावाद एवं गांधीवाद एवं समाज सुधार पर आधारित रहा। प्रेमचंद जी आम आदमी, किसान, शोषितों के जीवन से गहरे रूप से जुड़े हुए थे। उनके जीवन और साहित्य में सत्य, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों का ऊंचा स्थान रहा है।
इस कार्यक्रम में कॉलेज के विभिन्न प्रकोष्ठों के प्रभारी , प्राध्यापक एवं छात्रगण उपस्थित रहे। इस कार्यक्रम में राजकुमारी पाण्डेय, आशा रानी, मीना शर्मा , अनिरुद्ध कुमार, पुनीत चांदला, बलवंत, डिंपल गुप्ता, बीना मीना, सुंदरम शर्मा, आनंद कुमार, ललिता सिंह, पवन कुमार, जयपाल तथा विभिन्न विभागों के प्राध्यापक और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का कुशल संचालन हिंदी साहित्य सभा प्रभारी विकास शर्मा ने किया तथा औपचारिक धन्यवाद आनंद कुमार ने किया।
