‘युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होते हैं। यदि उनके सपनों को दिशा मिले तो वे देश का भविष्य बदल देते हैं, लेकिन यदि वे निराश हो जाएँ तो वही ऊर्जा असंतोष का रूप ले लेती है।’ भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यह स्थिति हमारे लिए एक अभूतपूर्व अवसर भी है और एक बड़ी चुनौती भी। हर वर्ष लाखों युवा विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों और व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं से निकलकर रोजगार की दुनिया में प्रवेश करते हैं। उनके मन में एक ही सपना होता है-सम्मानजनक रोजगार, सुरक्षित भविष्य और अपनी मेहनत के अनुरूप अवसर। लेकिन जब उन्हें बार-बार परीक्षा स्थगित होने, पेपर लीक, भर्ती में देरी या सीमित रोजगार के अवसरों का सामना करना पड़ता है, तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगाने लगता है। पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार ने बुनियादी ढाँचे, डिजिटल इंडिया, विदेशी निवेश, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, रक्षा आधुनिकीकरण और कल्याणकारी योजनाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। एक्सप्रेस-वे, वंदे भारत ट्रेनें, डिजिटल भुगतान प्रणाली, स्टार्टअप संस्कृति और वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भूमिका इसके उदाहरण हैं। किंतु इसके साथ ही एक प्रश्न लगातार उठता रहा है-क्या विकास की इस यात्रा में युवाओं की सबसे बड़ी चिंताओं को पर्याप्त प्राथमिकता मिली है?
रोजगार-सबसे बड़ा सवाल
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है, लेकिन रोजगार का प्रश्न अब भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है। लाखों शिक्षित युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बिताते हैं। निजी क्षेत्र में अवसर बढ़े हैं, लेकिन रोजगार की गुणवत्ता, वेतन और स्थायित्व को लेकर चिंताएँ बनी हुई हैं। सरकारी नौकरियाँ सीमित हैं और उनके लिए प्रतिस्पर्धा लगातार कठिन होती जा रही है। युवाओं की शिकायत केवल नौकरियों की संख्या को लेकर नहीं है, बल्कि भर्ती प्रक्रिया की गति और पारदर्शिता को लेकर भी है।
पेपर लीक और टूटता विश्वास
हाल के वर्षों में नीट-यूजी, यूजीसी-नेट और कई भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं को गहराई से प्रभावित किया। लाखों अभ्यर्थियों ने वर्षों की तैयारी, भारी आर्थिक निवेश और मानसिक संघर्ष के बाद परीक्षाएँ दीं। जब परीक्षाएँ रद्द हुईं या उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठे, तो उनके भीतर व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ना स्वाभाविक था। आज का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, वह निष्पक्ष अवसर चाहता है। उसे विश्वास होना चाहिए कि उसकी मेहनत का परिणाम किसी भ्रष्ट तंत्र की भेंट नहीं चढ़ेगा।
भर्ती में देरी भी बड़ी समस्या
रेलवे, एसएससी और अन्य सरकारी विभागों की कई भर्तियों में वर्षों तक परिणाम और नियुक्ति प्रक्रिया लंबित रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कई उम्मीदवार आयु सीमा पार कर जाते हैं। वर्षों की तैयारी और संघर्ष के बाद भी नियुक्ति न मिलना युवाओं में गहरी निराशा पैदा करता है।
अग्निपथ योजना और युवा
अग्निपथ योजना भी युवाओं के बीच व्यापक बहस का विषय रही। सरकार ने इसे सेना के आधुनिकीकरण और युवा प्रोफाइल तैयार करने की दिशा में बड़ा सुधार बताया, जबकि अनेक सैन्य अभ्यर्थियों ने इसे स्थायी रोजगार के अवसर कम होने के रूप में देखा। यह विवाद इस बात का उदाहरण है कि किसी भी नीति की सफलता केवल उसके उद्देश्य पर नहीं, बल्कि समाज द्वारा उसकी स्वीकार्यता पर भी निर्भर करती है।
महँगाई और बढ़ता आर्थिक दबाव
महँगाई का प्रभाव केवल गरीबों तक सीमित नहीं रहता। शिक्षित मध्यम वर्ग और युवा भी इससे प्रभावित होते हैं। किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और दैनिक जीवन का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में नौकरी मिलने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा का एहसास कम होता जा रहा है।
क्या सरकार का पक्ष नहीं है?
निश्चित रूप से है। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने स्टार्टअप इंडिया, स्किल इंडिया, प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाओं के माध्यम से रोजगार और उद्यमिता को बढ़ावा देने का प्रयास किया है। सरकार का तर्क है कि बड़े आर्थिक सुधारों के परिणाम समय के साथ अधिक स्पष्ट होंगे और भारत वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह भी सच है कि देश में सड़क, रेल, हवाई अड्डे, डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक अवसंरचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय विस्तार हुआ है। इसलिए पूरे परिदृश्य को एक ही दृष्टिकोण से देखना उचित नहीं होगा।
विद्वानों की राय
प्रख्यात अर्थशास्त्री डॉ. रघुराम राजन का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजित करना है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अमत्र्य सेन लगातार शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश को विकास की सबसे मजबूत नींव बताते रहे हैं। वहीं प्रो. अभिजीत बनर्जी का मत है कि आर्थिक विकास तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति और युवाओं तक पहुँचे। इन विचारों से स्पष्ट है कि आर्थिक विकास का वास्तविक मूल्यांकन तभी होगा जब वह युवाओं के जीवन में अवसर, सुरक्षा और सम्मान का रूप ले।
भविष्य की राह
यदि सरकार युवाओं का विश्वास और अधिक मजबूत करना चाहती है तो कुछ कदम अत्यंत आवश्यक हैं-
1.भर्ती परीक्षाओं को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाया जाए।
2.पेपर लीक पर कठोरतम दंड सुनिश्चित हो।
3.सरकारी भर्तियों को समयबद्ध बनाया जाए।
4.कौशल विकास को उद्योगों की वास्तविक आवश्यकताओं से जोड़ा जाए।
5. एमएसएमई और स्टार्टअप को अधिक प्रोत्साहन मिले।
6.शिक्षा व्यवस्था को रोजगारोन्मुख बनाया जाए।
7.महँगाई नियंत्रण और रोजगार सृजन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
यह कहना उचित नहीं होगा कि सरकार ने कुछ भी नहीं किया, और यह कहना भी सही नहीं होगा कि युवाओं की सभी समस्याएँ समाप्त हो चुकी हैं। वास्तविकता इन दोनों के बीच है। युवाओं का असंतोष लोकतंत्र के लिए खतरा नहीं, बल्कि एक संदेश है। ऐसा संदेश जिसे सुनना और समझना आवश्यक है। यदि भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्था बनना है तो उसकी सबसे बड़ी शक्ति, अर्थात् उसके युवाओं के विश्वास, प्रतिभा और परिश्रम को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। सरकार, विपक्ष, शिक्षण संस्थान और समाज, सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि वे ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ हर युवा यह विश्वास कर सके कि उसकी मेहनत का सम्मान होगा और उसका भविष्य केवल उसके परिश्रम से तय होगा, किसी व्यवस्था की कमजोरी से नहीं। जब युवाओं के सपनों को उड़ान मिलेगी, तभी भारत का भविष्य वास्तव में स्वर्णिम होगा।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
कवि एवं पत्रकार
