राजस्थान सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपरलीक रोकने के लिए देश के सबसे कठोर कानूनों में से एक लागू करने का निर्णय लिया है। इस कानून के अंतर्गत पेपरलीक कराने वाले संगठित गिरोहों के लिए आजीवन कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार भी सार्वजनिक परीक्षाओं की सुरक्षा को और सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से कानून को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। निस्संदेह यह एक स्वागतयोग्य पहल है। किन्तु सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या केवल कानून सख़्त कर देने से पेपरलीक की घटनाएँ रुक जाएँगी? पिछले दो दशकों का अनुभव बताता है कि उत्तर है नहीं। कठोर कानून जितना आवश्यक है, उससे कहीं अधिक आवश्यक है उसका कठोर, निष्पक्ष और समयबद्ध क्रियान्वयन। प्रतियोगी परीक्षाएँ केवल नौकरी पाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि करोड़ों युवाओं के सपनों, संघर्ष और भविष्य की आधारशिला हैं। एक पेपरलीक लाखों अभ्यर्थियों की वर्षों की मेहनत पर पानी फेर देता है। परीक्षा निरस्त होती है, नियुक्तियाँ टल जाती हैं, युवाओं की आयु सीमा प्रभावित होती है और व्यवस्था के प्रति उनका विश्वास डगमगा जाता है।
पेपरलीक का फैलता दायरा
विभिन्न अध्ययनों और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पिछले एक दशक में देशभर में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं से जुड़े अनेक बड़े पेपरलीक सामने आए हैं। इन घटनाओं से करोड़ों अभ्यर्थी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित हुए। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इन घटनाओं का कोई समेकित राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे समस्या की वास्तविक व्यापकता का आकलन करना कठिन हो जाता है।
किन राज्यों में सबसे अधिक पेपरलीक हुए
यद्यपि राज्यवार कोई आधिकारिक सूची उपलब्ध नहीं है, फिर भी सार्वजनिक अभिलेखों और चर्चित मामलों के आधार पर निम्नलिखित राज्य सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं-
1. राजस्थान-राजस्थान पिछले कुछ वर्षों में पेपरलीक की सबसे अधिक घटनाओं के कारण चर्चा में रहा। रीट, द्वितीय श्रेणी शिक्षक भर्ती, उपनिरीक्षक भर्ती, पटवारी, पुस्तकालयाध्यक्ष, कनिष्ठ अभियन्ता तथा अन्य अनेक भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताएँ सामने आईं। हजारों गिरफ्तारियाँ हुईं, अनेक परीक्षाएँ रद्द करनी पड़ीं और लाखों अभ्यर्थी प्रभावित हुए। यही कारण है कि राज्य ने अब सबसे कठोर कानून बनाने का निर्णय लिया है।
2. उत्तर प्रदेश-उत्तर प्रदेश में पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा, समीक्षा अधिकारी तथा सहायक समीक्षा अधिकारी परीक्षा सहित कई भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक के आरोप लगे। वर्ष 2024 में लगभग 48 लाख अभ्यर्थियों की पुलिस भर्ती परीक्षा निरस्त करनी पड़ी। यह देश के सबसे बड़े परीक्षा संकटों में से एक था।
3. बिहार-बिहार में बीपीएससी की संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा, सिपाही भर्ती तथा राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों ने राष्ट्रीय स्तर पर चिंता उत्पन्न की। जाँच एजेंसियों ने अंतरराज्यीय गिरोहों की सक्रियता की ओर संकेत किया।
4. मध्य प्रदेश-व्यापम घोटाला भारतीय इतिहास के सबसे बड़े परीक्षा घोटालों में गिना जाता है। चिकित्सा, अभियांत्रिकी और सरकारी नौकरियों से जुड़ी अनेक परीक्षाएँ वर्षों तक इसकी चपेट में रहीं। यह केवल पेपरलीक का मामला नहीं था, बल्कि पूरे भर्ती तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार का प्रतीक बन गया।
5. गुजरात-प्रधान लिपिक, कनिष्ठ लिपिक तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में पेपरलीक की घटनाओं ने राज्य सरकार को कठोर कानून बनाने के लिए विवश किया।
6. उत्तराखंड-उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की भर्ती परीक्षा में पेपरलीक के बाद राज्य ने देश के सबसे कठोर नकल विरोधी कानूनों में से एक लागू किया।
7. महाराष्ट्र-शिक्षक पात्रता परीक्षा तथा अन्य भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं ने परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाए। स्पष्ट है कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है। पेपरलीक अब संगठित अपराध का रूप ले चुका है, जिसकी जड़ें अनेक राज्यों तक फैली हुई हैं।
कठोर कानून के बावजूद सफलता क्यों नहीं
देश के अनेक राज्यों ने समय-समय पर कठोर कानून बनाए। सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया गया। हजारों पृष्ठों की विवेचनाएँ तैयार हुईं। फिर भी दोषसिद्धि के मामले अपेक्षाकृत बहुत कम दिखाई देते हैं।
इसका कारण है-
1.विवेचना में अत्यधिक विलम्ब।
2.वर्षों तक लंबित न्यायिक प्रक्रिया।
3.मुख्य सूत्रधारों तक पहुँचने में कठिनाई।
4.तकनीकी साक्ष्यों का अभाव।
5.विभिन्न राज्यों की जाँच एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी।
6.कई मामलों में प्रभावशाली लोगों के संरक्षण की आशंकाएँ।
जब अपराधी यह समझ जाता है कि मुकदमा वर्षों तक चलेगा और दण्ड की सम्भावना अनिश्चित है, तब कानून का भय स्वतः कम हो जाता है।
शिक्षा विशेषज्ञ क्या कहते हैं
राष्ट्रीय परीक्षा सुधार समिति के अध्यक्ष तथा भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अध्यक्ष डॉ. के. राधाकृष्णन ने परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधारों की अनुशंसा करते हुए स्पष्ट कहा था कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है। परीक्षा प्रक्रिया को प्रौद्योगिकी आधारित, पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना होगा। अनेक शिक्षाविदों का मत है कि परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता ही शिक्षा व्यवस्था की आत्मा है। यदि अभ्यर्थियों का विश्वास समाप्त हो जाए तो पूरी व्यवस्था खोखली हो जाती है। राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने भी कहा कि परीक्षा की पवित्रता और विश्वसनीयता सर्वोपरि है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि परीक्षा प्रणाली पर से विश्वास उठ गया तो इसका दुष्प्रभाव पूरे समाज पर पड़ेगा। यह टिप्पणी केवल एक मुकदमे तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण परीक्षा व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
केवल दण्ड नहीं, व्यवस्था भी बदले
पेपरलीक रोकने के लिए केवल कठोर दण्ड पर्याप्त नहीं होगा। कुछ बुनियादी सुधार अनिवार्य हैं-
1.प्रश्नपत्रों की बहुस्तरीय डिजिटल सुरक्षा। परीक्षा केन्द्रों की सतत निगरानी।
2.प्रत्येक मामले की अधिकतम तीन माह में विवेचना।
3.एक वर्ष के भीतर न्यायिक निर्णय।
4.दोषियों की संपत्ति की कुर्की।
5.परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की व्यक्तिगत जवाबदेही।
6.अंतरराज्यीय गिरोहों के विरुद्ध संयुक्त अभियान।
7.कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी व्यवस्था का उपयोग।
राजनीतिक इच्छाशक्ति सबसे आवश्यक
पेपरलीक केवल प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम नहीं है। इसके पीछे करोड़ों रुपये का अवैध कारोबार सक्रिय रहता है। जब तक इस आर्थिक तंत्र को ध्वस्त नहीं किया जाएगा और किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति को संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। कानून तभी प्रभावी होता है जब अपराधी को यह विश्वास हो जाए कि अपराध करने के बाद बच निकलना असंभव है।
युवाओं का विश्वास लौटाना होगा
आज देश का युवा केवल नौकरी नहीं चाहता, बल्कि निष्पक्ष अवसर चाहता है। वह चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य किसी दलाल, गिरोह या भ्रष्ट अधिकारी की मिलीभगत से न छीना जाए। यदि बार-बार परीक्षाएँ रद्द होंगी, परिणाम रुकेंगे और वर्षों तक मुकदमे चलते रहेंगे, तो युवाओं का विश्वास व्यवस्था से उठना स्वाभाविक है। राजस्थान का नया कानून निश्चित रूप से देश के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है। अन्य राज्यों को भी इससे सीख लेनी चाहिए। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि कानून की कठोरता से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका निष्पक्ष और त्वरित क्रियान्वयन है। पेपरलीक केवल प्रश्नपत्र की चोरी नहीं है, यह करोड़ों युवाओं के सपनों, उनके परिश्रम और उनके भविष्य की चोरी है। इसलिए अब समय केवल कठोर कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का है जिसमें अपराधी को शीघ्र दण्ड मिले, गिरोहों की आर्थिक कमर टूटे और प्रत्येक अभ्यर्थी को यह विश्वास हो कि उसकी सफलता केवल उसकी प्रतिभा और परिश्रम पर निर्भर करेगी। देश को अब सख़्त कानून के साथ सख़्त कार्रवाई भी चाहिए। यही युवाओं के विश्वास, शिक्षा व्यवस्था की गरिमा और राष्ट्र के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
