22 जून 2026 को लखनऊ के अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक भवन में संचालित कोचिंग सेंटर में लगी भीषण आग ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस हादसे में कम से कम 15 लोगों की जान चली गई, जिनमें अधिकांश छात्र थे। कई छात्र जान बचाने के लिए पहली मंजिल से कूद पड़े। यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम भी थी। यह पहला अवसर नहीं है। पिछले दस वर्षों में देश के अनेक कोचिंग संस्थानों में आग लगने की घटनाओं ने दर्जनों छात्रों की जान ली है और सैकड़ों को घायल किया है। हर घटना के बाद जांच, आदेश और आश्वासन मिलते हैं, लेकिन कुछ समय बाद सब कुछ फिर पहले जैसा हो जाता है। भारत सरकार के पास केवल कोचिंग सेंटरों में लगी आग का अलग राष्ट्रीय डेटाबेस उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रमुख घटनाओं का अध्ययन बताता है कि पिछले दस वर्षों में 15 से अधिक बड़ी आग की घटनाएँ सामने आईं। इनमें कम से कम 37-40 लोगों की मृत्यु हुई और 100 से अधिक छात्र घायल या झुलसे। वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है, क्योंकि छोटे शहरों की अनेक घटनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर दर्ज नहीं हो पातीं।
प्रमुख घटनाएँ
सूरत (2019)-तक्षशिला आर्केड के कोचिंग सेंटर में आग लगने से 22 छात्रों की मृत्यु हुई। जांच में सामने आया कि भवन में फायर एनओसी नहीं थी, लकड़ी की सीढ़ियाँ थीं और आपातकालीन निकास का अभाव था। तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया।
दिल्ली, मुखर्जी नगर (2023)-बिजली के शॉर्ट सर्किट से आग लगने पर छात्र रस्सियों और बिजली के तारों के सहारे नीचे उतरे। 61 छात्र घायल हुए। घटना के बाद उच्च न्यायालय ने सुरक्षा ऑडिट के आदेश दिए।
नागपुर (2026)-एक कोचिंग संस्थान में आग लगने के बाद जांच में पता चला कि भवन में आवश्यक फायर सुरक्षा उपकरण ही नहीं थे। लगभग 150 छात्र बाल-बाल बचे।
लखनऊ (2026)-नवीनतम हादसे में 15 लोगों की मौत ने एक बार फिर देश को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हमारे कोचिंग संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं।
कितने कोचिंग सेंटर
भारत में कोचिंग उद्योग आज लगभग 60-70 हजार करोड़ रुपये का बाजार बन चुका है। विभिन्न उद्योग अध्ययनों के अनुसार देश में लगभग 1 से 1.5 लाख छोटे-बड़े कोचिंग संस्थान संचालित हैं। इनमें से बड़ी संख्या स्थानीय स्तर पर संचालित होती है, जिनका समुचित पंजीकरण या नियमित सुरक्षा निरीक्षण नहीं होता।
अवैध संचालन कितना बड़ा संकट?
दिल्ली में मुखर्जी नगर अग्निकांड के बाद किए गए निरीक्षणों में पाया गया कि अधिकांश संस्थानों में गंभीर कमियाँ थीं। सुरक्षा ऑडिट में संकरे प्रवेश-द्वार, आपातकालीन निकास का अभाव, फायर अलार्म और स्प्रिंकलर न होना तथा क्षमता से अधिक छात्रों को बैठाना जैसी अनियमितताएँ मिलीं। इसके बाद जुलाई 2024 से फरवरी 2026 तक चलाए गए अभियान में 89 कोचिंग सेंटर सील किए गए। 505 कोचिंग सेंटरों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए। कुल 370 प्रतिष्ठानों पर कार्रवाई हुई। लखनऊ हादसे के बाद कानपुर में भी 16 कोचिंग सेंटर सील कर दिए गए और 22 अन्य के विरुद्ध कार्रवाई शुरू हुई।
आखिर आग क्यों लगती है?
विशेषज्ञों के अनुसार अधिकांश मामलों में कारण लगभग समान हैं। ओवरलोड विद्युत व्यवस्था और शॉर्ट सर्किट। बिना फायर एनओसी संचालन। बेसमेंट या अवैध मंजिलों में कक्षाएँ। केवल एक प्रवेश और निकास मार्ग। संकरी सीढ़ियाँ। अग्निशमन उपकरणों का अभाव। क्षमता से अधिक छात्रों की भीड़। नियमित सुरक्षा ऑडिट न होना।
सरकार कहाँ चूकी?
सरकारों ने नियम बनाए, लेकिन उनका पालन कराने में गंभीर कमी रही। सबसे बड़ी विफलताएँ रहीं-बिना अनुमति संस्थानों का वर्षों तक संचालन। नगर निगम, विकास प्राधिकरण और अग्निशमन विभाग के बीच समन्वय का अभाव। शिकायतों पर समय पर कार्रवाई न होना। राजनीतिक और स्थानीय दबाव में निरीक्षणों की अनदेखी। दुर्घटना के बाद ही अभियान चलाना। यही कारण है कि लगभग हर बड़ी दुर्घटना के बाद वही कमियाँ दोबारा सामने आती हैं।
सरकार ने क्या प्रयास किए
हाल के वर्षों में कई राज्यों ने बड़े स्तर पर अभियान चलाए हैं- विशेष फायर सेफ्टी ऑडिट। अवैध संस्थानों की सीलिंग। संयुक्त निरीक्षण दलों का गठन। जिम्मेदार अधिकारियों का निलंबन। संचालकों के विरुद्ध एफआईआर और गिरफ्तारी। फायर सुरक्षा नियमों को और सख्ती से लागू करने की पहल। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम अधिकतर दुर्घटना के बाद उठाए जाते हैं, न कि पहले।
विशेषज्ञों की राय
आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों और अग्नि सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि अब केवल दिशा निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। वे सुझाव देते हैं-प्रत्येक कोचिंग सेंटर का अनिवार्य पंजीकरण हो। फायर एनओसी के बिना संचालन पूरी तरह प्रतिबंधित हो। हर भवन में कम-से-कम दो आपातकालीन निकास अनिवार्य हों। प्रत्येक छह माह में स्वतंत्र फायर ऑडिट कराया जाए। बेसमेंट में कक्षाएँ पूर्णतः प्रतिबंधित हों। छात्र संख्या के अनुसार भवन क्षमता तय हो। नियमों का उल्लंघन करने पर केवल संचालक ही नहीं, संबंधित अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो। छात्रों के लिए नियमित मॉक ड्रिल और आपदा प्रशिक्षण अनिवार्य किया जाए।
कोचिंग सेंटर आज लाखों युवाओं के भविष्य का आधार हैं, लेकिन यदि वे स्वयं सुरक्षित नहीं हैं तो यह व्यवस्था गंभीर प्रश्नों के घेरे में है। सूरत से लेकर मुखर्जी नगर और अब लखनऊ तक हर त्रासदी ने यही संदेश दिया है कि दुर्घटनाएँ केवल आग से नहीं होतीं, बल्कि नियमों की अनदेखी, प्रशासनिक ढिलाई और लालच से भी होती हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए, तो अगली त्रासदी केवल समय का प्रश्न होगी। शिक्षा का उद्देश्य भविष्य बनाना है, उसे छात्रों के लिए जोखिम का पर्याय नहीं बनने दिया जा सकता।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
