‘हो के मायूस न यूँ शाम से ढलते रहिए,
ज़िंदगी भोर है, सूरज से निकलते रहिए।’
इन दो पंक्तियों में महाकवि डॉ. कुंअर बेचैन का समूचा जीवन-दर्शन समाया हुआ है। निराशा के अंधकार में आशा का दीप जलाना, टूटते हुए मनुष्य को जीने का साहस देना और संवेदनाओं को शब्दों की गरिमा प्रदान करना, यही उनकी रचनात्मक साधना का मूल स्वर था। 1 जुलाई 1942 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के उमरी गाँव में जन्मे डॉ. कुंअर बेचैन (वास्तविक नाम डॉ. कुंअर बहादुर सक्सेना) ने हिंदी कविता, गीत और गजल को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। वे लंबे समय तक गाजियाबाद के एम.एम.एच. कॉलेज में हिंदी विभागाध्यक्ष रहे और देश-विदेश के कवि सम्मेलनों में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा का संगीत है। उन्होंने प्रेम को केवल निजी अनुभूति नहीं माना, बल्कि उसे मनुष्य और समाज के बीच विश्वास का सेतु बनाया। उनकी कविता में गाँव की मिट्टी की सोंधी गंध भी है और महानगर की बेचैनी भी। उनके गीतों में प्रकृति की कोमलता है तो गजलों में समय की तल्ख सच्चाइयों का साहसिक बयान। वे मानते थे कि कविता का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य को भीतर से बेहतर बनाना भी है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, जितनी अपने समय में थीं।
‘उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह,
और ऊँचा, और ऊँचा, और ऊँचा हो गया।’
यह शेर केवल प्रतिकूल परिस्थितियों का उत्तर नहीं, बल्कि उनके जीवन-दर्शन का परिचय भी है। संघर्ष उनके जीवन में भी कम नहीं थे, किंतु उन्होंने विषमताओं को अपनी रचनात्मक ऊर्जा में बदल दिया। शायद यही कारण है कि उनकी कविता शिकायत नहीं करती, बल्कि जीवन का हाथ थामकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
डॉ. कुंअर बेचैन ने हिंदी मंचीय कविता को अभूतपूर्व गरिमा प्रदान की। वे उन विरले कवियों में थे, जिनकी लोकप्रियता कभी उनकी साहित्यिक गुणवत्ता पर भारी नहीं पड़ी। वे जब मंच पर आते थे तो शब्द अभिनय नहीं करते थे, बल्कि हृदय बोलता था। उनकी वाणी में विनम्रता थी, प्रस्तुति में सहजता और भावों में ऐसी आत्मीयता कि श्रोता स्वयं को कविता का हिस्सा महसूस करने लगते थे।
उनकी गजलों का एक बड़ा गुण उनकी संप्रेषणीयता है। वे कठिन से कठिन भाव को भी अत्यंत सरल भाषा में व्यक्त कर देते थे। इसलिए उनका साहित्य विश्वविद्यालयों के शोध का विषय भी बना और सामान्य पाठकों की प्रिय धरोहर भी। डॉ. कुंअर बेचैन केवल बड़े कवि नहीं थे, वे बड़े मनुष्य भी थे। साहित्य-जगत में उनकी पहचान एक स्नेही मार्गदर्शक के रूप में थी। असंख्य युवा कवियों को उन्होंने प्रोत्साहन दिया। मंच साझा करते समय वे नए रचनाकारों को उतना ही सम्मान देते थे, जितना वरिष्ठों को। यही कारण है कि उनके शिष्यों और प्रशंसकों का विशाल परिवार आज भी उन्हें केवल कवि नहीं, बल्कि एक संस्कार के रूप में याद करता है। उनकी रचनाओं में रिश्तों की ऊष्मा बार-बार दिखाई देती है। वे जानते थे कि आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी संवेदनाओं का क्षरण है। इसलिए उनकी कविताएँ मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं।
‘उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था जिसे,
राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।’
इन पंक्तियों में केवल एक व्यक्ति का दर्द नहीं, बल्कि बदलते सामाजिक संबंधों की पूरी कहानी छिपी है। यही उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता थी कि वे व्यक्तिगत अनुभव को सामाजिक संवेदना में बदल देते थे। डॉ. कुंअर बेचैन ने गीत, नवगीत, गजल, दोहा, कविता, उपन्यास और आलोचना, लगभग सभी विधाओं में महत्त्वपूर्ण लेखन किया। उनकी अनेक कृतियाँ हिंदी साहित्य की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने साहित्य को किसी विचारधारा की सीमाओं में नहीं बाँधा। उनके लिए मनुष्य सबसे बड़ा सत्य था और संवेदना सबसे बड़ा धर्म। आज जब समाज संवाद से अधिक विवाद में उलझा दिखाई देता है, जब तकनीक ने निकटता तो बढ़ाई है पर आत्मीयता कम कर दी है, तब डॉ. कुंअर बेचैन की कविताएँ हमें फिर से मनुष्य बनने का पाठ पढ़ाती हैं। उनकी रचनाएँ बताती हैं कि प्रेम, विश्वास, करुणा और सह-अस्तित्व केवल साहित्यिक शब्द नहीं, बल्कि सभ्यता की आधारशिलाएँ हैं।
उनकी भाषा का सबसे बड़ा सौंदर्य उसकी सहजता है। वे अलंकारों के मोह में नहीं उलझते, बल्कि सीधे हृदय तक पहुँचते हैं। यही कारण है कि उनकी पंक्तियाँ वर्षों बाद भी स्मृति में जीवित रहती हैं। उनकी कविता पढ़ते हुए लगता है जैसे कोई आत्मीय व्यक्ति जीवन का अनुभव साझा कर रहा हो। 29 अप्रैल 2021 को उनका शारीरिक अवसान हुआ, किंतु कवि कभी नहीं मरता। वह अपनी रचनाओं में जीवित रहता है। आज भी देशभर के कवि सम्मेलन, साहित्यिक गोष्ठियाँ और युवा रचनाकार उनकी पंक्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। गाजियाबाद की साहित्यिक पहचान का उल्लेख उनके बिना अधूरा माना जाता है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं, बल्कि उस संवेदनशील भारतीय मन को प्रणाम करना है जिसने कविता को जीवन की धड़कनों से जोड़ा। उनकी रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि शब्द तभी सार्थक हैं जब वे मनुष्य के आँसू पोंछ सकें, उसके चेहरे पर मुस्कान ला सकें और अँधेरे समय में आशा का दीप जला सकें। और शायद इसलिए उनकी ये पंक्तियाँ आज भी हर पीढ़ी के लिए एक संदेश बनकर गूँजती हैं-
‘यह दुनिया सूखी मिट्टी है
तू प्यार के छींटें देता चल।’
डॉ. कुंअर बेचैन का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल काव्य-संपदा नहीं, बल्कि संवेदना, संस्कृति और मनुष्यता की अमूल्य विरासत है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है और यही उन्हें हिंदी साहित्य के आकाश में सदैव प्रकाशित रखने वाली ज्योति।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
