उज्जैन | वर्तमान समय में हिंदी साहित्य की विधाओं में लघुकथा अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रही है। कम शब्दों में गहरी संवेदना, सामाजिक यथार्थ और तीखा संदेश देने की क्षमता के कारण लघुकथा समकालीन साहित्य की महत्वपूर्ण विधा बनकर उभरी है। बदलती जीवनशैली, समयाभाव और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव ने लघुकथा को पाठकों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाया है।
ये विचार प्रेमचंद सृजन पीठ और सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ महाविद्यालय में आयोजित ' समकालीन लघुकथा और आज का परिदृश्य विषय पर विमर्श में मुख्य वक्ता लघुकथा जगत के प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ. ध्रुव कुमार [पटना ] ने व्यक्त किये | उन्होंने कहा कि आज की लघुकथाएं सामाजिक विसंगतियों, पारिवारिक संबंधों, तकनीकी प्रभाव, राजनीतिक परिस्थितियों, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण, अकेलेपन और बदलते मानवीय मूल्यों जैसे विषयों को भी प्रभावी ढंग से सामने ला रही हैं। उन्होंने लघुकथा को पाठ्यक्रमों में लाए जाने की जरूरत पर जोर दिया प्रसिद्ध लघुकथाकार सतीश राज पुष्करणा जी के योगदान के बारे में उन्होंने प्रकाश डाला।
अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात समालोचक और सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ.शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने अतीत से लेकर वर्तमान समय तक का लघुकथा का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि लघुकथा समुद्र की बूँद की तरह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है। आज लघुकथा लेखन में स्त्री विमर्श, दिव्यांग, जनजातीय- दलित विमर्श , प्रवासी जीवन- कोई भी विषय अछूता नहीं है। पटना से लेकर उज्जैन तक, संपूर्ण विश्व में उसका दायरा है। आपने कहा कि लघुकथा में प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता, शब्दों की सादगी, प्रयोगधर्मिता का होना आवश्यक है। लेखक - पाठक एवं आलोचक के बीच यह संवाद है। गहरी प्रतिबद्धता के साथ लघु में विराट को देखना ही लघुकथा है।
विशेष अतिथि, ख्यात लघुकथाकार सन्तोष सुपेकर ने कहा कि लघुकथा के उज्ज्वल भविष्य के लिए लेखक को विश्व-दृष्टि विकसित करनी होगी, चेतना सम्पन्नता दर्शानी होगी |मनुष्य जीवन की वास्तविकताओं, भावनाओं, अन्तःसम्बन्धों, टकराहटों, समझौतों, और नाना प्रकार की जटिलताओं के बीच जिए जाते जीवन का एकदम नया, सर्जनात्मक रूप प्रस्तुत करने का प्रयास करना होगा। आत्मचेतस बनने के लिए विश्वचेतस होना आवश्यक है|भूख, शिक्षा, पर्यावरण, लैंगिक समानता, परमाणु हथियार, साइबर अपराध जैसे वैश्विक मुद्दों पर और अधिक रचना आवश्यक है।
विशेष अतिथि प्रख्यात फिल्म समीक्षक श्री शशांक दुबे ने कहा कि आज की लघुकथा के विषयों में नवीनता होना जरुरी है और पाठक को लघुकथा पढ़ते हुए अंत का आभास बिलकुल नहीं होना चाहिए और लघुकथा ऎसी चोट करे जिसका असर देर तक रहे |
इस अवसर पर डॉ.ध्रुव कुमार का सम्मान सरल काव्यांजलि के अध्यक्ष डॉ. संजय नागर, सचिव मानसिंह शरद तथा जैन कवि संगम की ओर से अध्यक्ष सुगनचंद जैन, दिलीप जैन,संदीप सृजन आदि सदस्यों द्वारा किया गया |
इस अवसर पर शहर के लघुकथाकारों डॉ. वंदना गुप्ता , आशा गंगा प्रमोद शिरढोनकर, डॉ.हरीशकुमार सिंह , संतोष सुपेकर ,मुकेश जोशी , डॉ. प्रभाकर शर्मा , रमेशचन्द्र शर्मा , डॉ. स्वामीनाथ पाण्डेय , मानसिंह शरद , कमलेश व्यास कमल , संदीप सृजन , डॉ. नेत्रा रावणकर , रमेश मनोहरा ( जावरा), राजेन्द्र नागर निरंतर , सीमा पंड्या , दिलीप जैन , योगेन्द्र माथुर , अनिल पांचाल ,डॉ. रश्मि मोयदे आदि ने अपनी प्रभावी लघुकथाओं का पाठ किया | विमर्श में वरिष्ठ कवि सर्वश्री अशोक भाटी, दिनेश दिग्गज, सुरेन्द्र सर्किट ,संदीप कुलश्रेष्ठ , डॉ. संजय नागर , प्रफुल्ल शुक्ल , अखिलेश चौरे , प .लोकेन्द्र शास्त्री , गिरिजा देवी ठाकुर आदि उपस्थित थे | स्वागत भाषण प्रेमचंद सृजन पीठ के अध्यक्ष मुकेश जोशी ने दिया | संचालन डॉ. हरीशकुमार सिंह ने और आभार डॉ. वंदना गुप्ता ने व्यक्त किया |
19 जून 2026
-मुकेश जोशी
निदेशक
प्रेमचंद सृजन पीठ ,उज्जैन
