जनसंख्या विस्फोट से जनसंख्या संकट तक क्या दुनिया बच्चों के अभाव की ओर बढ़ रही है?
June 13, 2026
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सन् 1968 में अमेरिकी जीवविज्ञानी पॉल एहरलीच ने अपनी चर्चित पुस्तक द पापुलेशन बम में चेतावनी दी थी कि बढ़ती जनसंख्या मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है। उस समय दुनिया की आबादी लगभग 3.5 अरब थी और आशंका व्यक्त की जा रही थी कि पृथ्वी के संसाधन बढ़ती आबादी का बोझ नहीं उठा पाएंगे। आज, लगभग छह दशक बाद, दुनिया की आबादी 8 अरब को पार कर चुकी है, लेकिन चिंता का विषय बदल चुका है। अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि दुनिया में लोग बहुत अधिक बच्चे पैदा कर रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या दुनिया पर्याप्त बच्चे पैदा कर रही है? संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक जनसांख्यिकीय अध्ययनों के अनुसार 1950 के दशक में विश्व की कुल प्रजनन दर (टोटल फर्टिलिटी रेट ) लगभग 5 बच्चे प्रति महिला थी। 2023 तक यह घटकर लगभग 2.3 रह गई है और सदी के मध्य तक इसके प्रतिस्थापन स्तर 2.1 तक पहुँचने या उससे नीचे जाने का अनुमान है। मानव इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि जन्मदर इतनी तेजी से गिरी हो। वैश्विक आंकड़े बताते हैं कि 1950 में औसत महिला लगभग 5 बच्चों को जन्म देती थी। आज दुनिया के अधिकांश देशों में यह संख्या आधी से भी कम रह गई है। 2026 के विश्लेषणों के अनुसार विश्व की लगभग 71 प्रतिशत आबादी ऐसे देशों में रहती है जहाँ जन्मदर प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। यह केवल सामाजिक परिवर्तन नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन भी है। जिन देशों को कभी जनसंख्या विस्फोट से डर था, वे आज बच्चों की कमी से चिंतित हैं।
जापान-भविष्य की एक झलक
यदि कोई देश दुनिया को भविष्य की चेतावनी देता है तो वह जापान है। जापान में लगातार घटती जन्मदर और बढ़ती आयु ने समाज की संरचना बदल दी है। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल बंद हो रहे हैं क्योंकि वहाँ पर्याप्त बच्चे नहीं बचे। लाखों घर खाली पड़े हैं। बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जबकि कामकाजी युवाओं की संख्या घट रही है। जापानी सरकार विवाह प्रोत्साहन, बाल-पालन सहायता, कर छूट और नकद प्रोत्साहन जैसी योजनाएँ चला रही है, लेकिन जन्मदर में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ।
दक्षिण कोरिया का संकट
दक्षिण कोरिया आज दुनिया की सबसे कम प्रजनन दर वाले देशों में शामिल है। वहाँ महंगे घर, अत्यधिक प्रतिस्पर्धी शिक्षा व्यवस्था, लंबी कार्य संस्कृति और बढ़ती जीवन-यापन लागत के कारण युवा विवाह और मातृत्व-पितृत्व से दूर होते जा रहे हैं। सरकार अरबों डॉलर खर्च कर चुकी है, लेकिन सामाजिक प्रवृत्तियों को बदलना आसान नहीं साबित हुआ।
चीन-नीति का ऐतिहासिक उलटफेर
1979 में चीन ने एक-बच्चा नीति लागू की थी। उस समय उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को रोकना था। लेकिन चार दशक बाद स्थिति बदल गई। अब चीन लोगों को दो और तीन बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। लगातार घटती जन्मदर और सिकुड़ती कार्यशील आबादी ने चीन की आर्थिक योजनाओं को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जिस देश ने कभी जन्म को नियंत्रित किया था, वही आज जन्म बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। यह इतिहास का एक अनोखा मोड़ है।
भारत की बदलती कहानी
भारत आज दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है, लेकिन भारत की जन्मदर भी तेजी से गिर रही है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफसी-5) के अनुसार भारत की कुल प्रजनन दर 2.0 तक पहुँच चुकी है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से नीचे है। 1992 में एनएचएफसी-1 के दौरान भारत की प्रजनन दर लगभग 3.4 थी। अर्थात् तीन दशकों में देश ने अपनी प्रजनन दर में लगभग 40 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्ज की है। ताजा सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के अनुसार भारत की प्रजनन दर 1.9 तक पहुँच चुकी है। केवल कुछ राज्य ही अब प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर बचे हैं।
दिल्ली, पंजाब और दक्षिण भारत की तस्वीर
दिल्ली, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जन्मदर काफी नीचे जा चुकी है। दिल्ली की प्रजनन दर देश में सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है। दूसरी ओर बिहार और उत्तर प्रदेश अभी भी राष्ट्रीय औसत से ऊपर हैं। यह अंतर बताता है कि शिक्षा, शहरीकरण, महिलाओं की कार्य भागीदारी और जीवनशैली का जन्मदर पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
कामकाजी दम्पत्तियों की नई दुनिया
आज का युवा दम्पत्ति अपने माता-पिता की पीढ़ी से अलग सोचता है। पहले विवाह जल्दी होते थे, परिवार जल्दी बनता था और तीन-चार बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। आज स्थिति बदल गई है। उच्च शिक्षा में अधिक समय लग रहा है। करियर प्राथमिकता बन चुका है। घर खरीदना कठिन हो गया है। बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ गया है। महिलाएँ आर्थिक रूप से अधिक स्वतंत्र हैं। महानगरों में जीवन-यापन महंगा हो गया है। परिणामस्वरूप लाखों दम्पत्ति परिवार विस्तार का निर्णय टाल रहे हैं या केवल एक बच्चे तक सीमित रहना पसंद कर रहे हैं।
जनसंख्या घटेगी तो समस्या क्या होगी?
सामान्य धारणा यह है कि कम जनसंख्या हमेशा अच्छी होती है। लेकिन अर्थशास्त्री इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। जब जन्म कम होते हैं तो कुछ दशकों बाद कार्यशील आयु की आबादी घटती है, उद्योगों को श्रमिकों की कमी होती है, पेंशन व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है, आर्थिक विकास की गति धीमी हो सकती है। इसी कारण जापान, जर्मनी, इटली और दक्षिण कोरिया जैसे देश कम जन्मदर को राष्ट्रीय चुनौती मानते हैं।
क्या भारत को डरना चाहिए?
फिलहाल भारत दुनिया का सबसे युवा बड़ा देश है। भारत की औसत आयु लगभग 29 वर्ष के आसपास है जबकि जापान और यूरोप के अनेक देशों में यह 45 से 50 वर्ष तक पहुँच चुकी है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। इसे ‘जनसांख्यिकीय लाभांश’ कहा जाता है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि जन्मदर लगातार नीचे जाती रही तो 2040-2050 के बाद भारत को भी वृद्ध होती आबादी और घटते कार्यबल जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
20वीं और 21वीं सदी का अंतर
20वीं सदी का सबसे बड़ा प्रश्न था-‘जनसंख्या को कैसे नियंत्रित किया जाए?’, मगर 21वीं सदी का उभरता हुआ प्रश्न है-‘पर्याप्त जनसंख्या कैसे बनाए रखी जाए?’, यही वह परिवर्तन है जो दुनिया की जनसांख्यिकीय बहस को नई दिशा दे रहा है।
दुनिया एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है। कभी जनसंख्या विस्फोट मानवता का सबसे बड़ा डर था। आज अनेक देशों के सामने जनसंख्या संकट खड़ा है। घटती जन्मदर, बढ़ती बुजुर्ग आबादी और सिकुड़ता कार्यबल नई चुनौतियाँ बनकर उभर रहे हैं। भारत अभी युवा शक्ति के स्वर्णकाल में है, लेकिन बदलती जीवनशैली, छोटे परिवारों की प्रवृत्ति और गिरती प्रजनन दर संकेत दे रही है कि आने वाले दशकों में हमें भी जनसंख्या संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा। कल तक दुनिया बच्चों की बढ़ती संख्या से डरती थी, आज कई देश बच्चों की घटती संख्या से चिंतित हैं। इतिहास का यह शायद सबसे बड़ा जनसांख्यिकीय उलटफेर है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
