-ओमप्रकाश प्रजापति
सुबह के सात बजे हैं। सूरज अभी पूरी तरह सिर पर भी नहीं आया, लेकिन हवा में ऐसी तपिश घुल चुकी है मानो दोपहर उतर आई हो। शाम के सात बजे भी सड़कों से गर्मी की भाप उठती महसूस होती है। पंखे थक चुके हैं, कूलर हार मान चुके हैं और एसी अब सुविधा नहीं, आवश्यकता बनता जा रहा है। प्रश्न यह है कि आखिर यह कौन-सा आतंक है, जो बिना बंदूक, बिना बारूद और बिना किसी सीमा के पूरी दुनिया पर हमला कर रहा है? यह आतंक किसी संगठन का नहीं, बल्कि हमारी अपनी जीवनशैली, अंधाधुंध विकास और प्रकृति के साथ किए गए अन्याय का परिणाम है। यह “गर्मी का आतंक” है जो धीरे-धीरे हमारे शरीर, समाज, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों को निगलता जा रहा है। एक समय था जब गर्मियां ऋतु का आनंद हुआ करती थीं। आम के बाग, पेड़ों की छांव, मिट्टी की सोंधी खुशबू और शाम की ठंडी हवाएं जीवन में सहजता भर देती थीं। लेकिन आज गर्मी मौसम नहीं, भय का पर्याय बनती जा रही है। अब लोग सूरज से नहीं, तापमान के आंकड़ों से डरते हैं। स्कूलों में छुट्टियां बढ़ रही हैं, खेत सूख रहे हैं, जलाशय खाली हो रहे हैं और शहर कंक्रीट के तंदूर में बदलते जा रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि तापमान 45 या 50 डिग्री क्यों पहुंच रहा है, बल्कि यह है कि हमारी संवेदनाएं क्यों ठंडी पड़ती जा रही हैं? हमने विकास के नाम पर जंगल काट दिए। नदियों को नालों में बदल दिया। पहाड़ों को खोखला कर दिया। शहरों को सीमेंट और धुएं की प्रयोगशाला बना दिया। हर व्यक्ति अपने घर में ठंडक चाहता है, लेकिन घर के बाहर एक भी पेड़ लगाने को तैयार नहीं। हम वातानुकूलित कमरों में बैठकर पर्यावरण दिवस मनाते हैं और बाहर धरती तपती रहती है।विडंबना यह है कि जिस प्रकृति ने हमें जीवन दिया, उसी को हमने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया। आज प्रकृति बदला नहीं ले रही, केवल अपना संतुलन वापस मांग रही है। यह बढ़ती गर्मी केवल शरीर को नहीं झुलसा रही, बल्कि जीवन के कई आयामों को प्रभावित कर रही है। यहां कद केवल शारीरिक ऊंचाई का प्रतीक नहीं, बल्कि मानवीय व्यक्तित्व और सहनशीलता का भी संकेत है। गर्मी के कारण बच्चों का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है। पौष्टिकता की कमी, प्रदूषण और जल संकट आने वाली पीढ़ियों को कमजोर बना रहे हैं। साथ ही, मनुष्य का नैतिक कद भी छोटा होता जा रहा है। हम सुविधाओं के लिए पेड़ काटते हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ी के भविष्य की चिंता नहीं करते। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हृदय रोग, फेफड़ों की समस्याएं और मानसिक तनाव, ये सब बढ़ती गर्मी के दुष्प्रभाव हैं। विश्व स्वास्थ्य संस्थाओं की रिपोर्टें लगातार चेतावनी दे रही हैं कि जलवायु परिवर्तन आने वाले वर्षों में करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालेगा।
पहले लोग प्राकृतिक जीवन जीते थे, इसलिए अधिक स्वस्थ रहते थे। आज मशीनों के बीच जीवन आसान तो हुआ है, लेकिन लंबा और संतुलित नहीं। यह शायद सबसे बड़ा संकट है। लोगों का प्रकृति पर विश्वास कम हो रहा है। ऋतुओं का संतुलन बिगड़ चुका है।
बरसात समय पर नहीं आती, सर्दी अचानक गायब हो जाती है और गर्मी अपनी सीमाएं तोड़ देती है। जब प्रकृति असंतुलित होती है, तब समाज भी अस्थिर होने लगता है। जल संकट, खाद्य संकट और पलायन जैसी समस्याएं सामाजिक तनाव को जन्म देती हैं। क्या हम अपने बच्चों को केवल एसी, एयर प्यूरीफायर और पानी की बोतलें देकर जाएंगे?
क्या आने वाली पीढ़ी पेड़ों को केवल किताबों में देखेगी? क्या नदी का अर्थ केवल पुरानी तस्वीरों तक सीमित रह जाएगा? यह प्रश्न केवल सरकारों से नहीं, हर व्यक्ति से है।
क्योंकि पृथ्वी किसी एक देश, एक समाज या एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं, यह आने वाले कल की धरोहर है। यदि आज भी हम नहीं जागे, तो भविष्य हमें कभी माफ नहीं करेगा।
गर्मी के इस आतंक से लड़ने के लिए केवल सेमिनार और नारों से काम नहीं चलेगा।
हमें अपने जीवन में वास्तविक परिवर्तन लाने होंगे, सबसे जरूरी है कि हम प्रकृति को “संसाधन” नहीं, “संबंध” समझें। गर्मी का यह आतंक किसी सीमा पर खड़ा दुश्मन नहीं, बल्कि हमारे भीतर पैदा हुई असंतुलित सोच का परिणाम है। धरती चीख रही है, नदियां सूख रही हैं, हवा जल रही है और इंसान अभी भी विकास के भ्रम में खोया हुआ है। अब भी समय है। यदि हमने प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को नहीं सुधारा, तो आने वाला समय केवल गर्म नहीं, भयावह होगा। हमें तय करना है कि हम अपनी भावी पीढ़ी को हरी-भरी धरती देंगे या धधकती हुई विरासत।
