-डॉ. चेतन आनंद
जिस माँ के दूध को भारतीय संस्कृति में “अमृत” कहा गया, यदि उसी में जहरीले तत्व मिलने लगें तो यह केवल एक स्वास्थ्य समाचार नहीं, बल्कि सभ्यता और व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है। हाल के वर्षों में बिहार से आई कई शोध रिपोर्टों ने देश को झकझोर दिया है। पहले माताओं के दूध में आर्सेनिक मिलने की बात सामने आई, फिर सीसा और अब यूरेनियम जैसे रेडियोधर्मी तत्व के अंश पाए जाने की खबरों ने चिंता को और गहरा कर दिया है। वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का कहना है कि यह केवल “माँ के दूध” का संकट नहीं, बल्कि पानी, मिट्टी, भोजन और पूरे पर्यावरण के विषाक्त होते जाने का संकेत है।
हाल में बिहार के छह जिलों-कटिहार, खगड़िया, समस्तीपुर, बेगूसराय, भोजपुर और नालंदा में स्तनपान कराने वाली महिलाओं के दूध के नमूनों की जाँच की गई। अध्ययन में 40 महिलाओं के सैंपल लिए गए और हर नमूने में यूरेनियम (यू-238) के अंश पाए गए। कुछ नमूनों में इसकी मात्रा 5.25 यूजीएल तक दर्ज की गई। यह अध्ययन चिकित्सा जगत में गंभीर चर्चा का विषय बन गया। एम्स दिल्ली से जुड़े डॉ. अशोक शर्मा, जो इस शोध से जुड़े रहे, ने कहा कि अध्ययन में लगभग 70 प्रतिशत शिशुओं में “संभावित नाॅन-कारसिनोजेनिक रिस्क दिखाई दिया। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि माताओं को स्तनपान बंद नहीं करना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में भी माँ का दूध शिशु के लिए सर्वोत्तम पोषण माना जाता है। यूरेनियम का मामला सामने आने से पहले बिहार में माताओं के दूध में आर्सेनिक मिलने की रिपोर्ट ने भी वैज्ञानिकों को चिंतित किया था। गंगा के मैदानी क्षेत्रों में हुए एक बड़े अध्ययन में 378 महिलाओं के दूध के नमूनों की जाँच हुई। उनमें से लगभग 55 प्रतिशत नमूनों में विश्व स्वास्थ्य संगठन की सीमा से अधिक आर्सेनिक पाया गया। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि बच्चों के मूत्र तथा चावल, गेहूँ और आलू जैसे खाद्य पदार्थों में भी आर्सेनिक के अंश मौजूद थे। विशेषज्ञों ने इसका मुख्य कारण भूजल प्रदूषण को माना। आर्सेनिक मानव शरीर के लिए अत्यंत खतरनाक माना जाता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से त्वचा रोग, कैंसर, तंत्रिका तंत्र की कमजोरी और बच्चों के मानसिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि नवजात शिशुओं का शरीर बेहद संवेदनशील होता है, इसलिए ऐसे तत्वों का प्रभाव उन पर और गंभीर हो सकता है। इसके बाद 2025 में महावीर कैंसर संस्थान, पटना द्वारा किए गए एक अध्ययन ने और भी भयावह तस्वीर प्रस्तुत की। अध्ययन में बिहार के छह जिलों की महिलाओं के दूध में भारी मात्रा में लेड (सीसा) पाया गया। रिपोर्ट के अनुसार लगभग 92 प्रतिशत नमूनों में डब्ल्यूएचओ मानकों से अधिक सीसा मौजूद था। कुछ नमूनों में इसकी मात्रा 1309 यूजीएल तक पहुँची। महिलाओं के रक्त और मूत्र में भी सीसा मिला तथा बच्चों के शरीर में भी इसके संकेत पाए गए।
डॉक्टरों के अनुसार सीसा बच्चों के मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर सीधा असर डालता है। इससे आईक्यू कम हो सकता है, सीखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है और मानसिक विकास बाधित हो सकता है। महावीर कैंसर संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. अरुण कुमार ने इसे “भविष्य की पीढ़ियों के लिए गंभीर चेतावनी” बताया। उनका कहना है कि यदि अभी भी पर्यावरण और जल सुरक्षा पर गंभीर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ये विषैले तत्व माताओं के शरीर तक पहुँच कैसे रहे हैं? वैज्ञानिकों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा कारण दूषित भूजल है। बिहार और झारखंड के कई क्षेत्रों में पहले से ही भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की समस्या रही है। अब यूरेनियम और सीसा के संकेत भी मिलने लगे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक प्रयोग, औद्योगिक कचरा, खनन गतिविधियाँ, दूषित मिट्टी और जल स्रोतों की उपेक्षा इस संकट को बढ़ा रहे हैं।
दरअसल, यह मामला केवल चिकित्सा विज्ञान का नहीं, बल्कि विकास मॉडल पर भी प्रश्न खड़ा करता है। भारत तेजी से औद्योगिक और आर्थिक विकास की ओर बढ़ रहा है, लेकिन पर्यावरणीय सुरक्षा लगातार पीछे छूटती जा रही है। नदियाँ प्रदूषित हैं, भूजल जहरीला होता जा रहा है और खेती में रसायनों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इसका असर अब सीधे मानव शरीर की सबसे संवेदनशील कड़ी माँ और नवजात शिशु तक पहुँच चुका है।
विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन रिपोर्टों का अर्थ यह नहीं कि हर माँ का दूध जहरीला हो गया है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ आज भी स्तनपान को शिशु के लिए सबसे सुरक्षित और सर्वोत्तम पोषण मानते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि लोग भय या भ्रम में आकर स्तनपान बंद न करें। असली चिंता माँ का दूध नहीं, बल्कि वह प्रदूषित पर्यावरण है जो धीरे-धीरे मानव शरीर के भीतर प्रवेश कर रहा है।
फिर भी यह स्थिति बेहद गंभीर है। यदि किसी समाज में माँ का दूध भी पर्यावरणीय प्रदूषण से अछूता न रहे, तो यह संकेत है कि संकट बहुत गहरा हो चुका है। यह केवल बिहार की समस्या नहीं, बल्कि पूरे भारत के लिए चेतावनी है। दुनिया के कई देशों में भी माताओं के दूध में माइक्रोप्लास्टिक, पारा, कीटनाशक और अन्य विषैले रसायनों के अंश मिलने लगे हैं। अर्थात आधुनिक विकास की कीमत अब आने वाली पीढ़ियाँ चुका रही हैं।
अब आवश्यकता केवल शोध और बहस की नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई की है। सरकारों को भूजल की व्यापक जाँच, शुद्ध पेयजल की उपलब्धता, औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा पर कठोर नीति बनानी होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और मातृ-शिशु स्वास्थ्य निगरानी की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। साथ ही लोगों में जागरूकता बढ़ानी होगी कि पर्यावरण संरक्षण अब केवल प्रकृति बचाने का विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व बचाने का प्रश्न बन चुका है।
भारतीय परंपरा में माँ को सृष्टि का आधार माना गया है। यदि उसी माँ के दूध तक जहर पहुँचने लगे, तो यह किसी एक राज्य या सरकार की विफलता नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय है। यह समय चेतने का है, क्योंकि यदि पानी, मिट्टी और हवा को अभी नहीं बचाया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल बीमार शरीर ही नहीं, बल्कि विषाक्त भविष्य भी विरासत में पाएँगी।
(लेखक कवि और पत्रकार हैं।)
