दिल्ली। जीवन में जो जितने अधिक धक्के खाता है, उतना ही अधिक और बेहतर लिख सकता है। जिसका जीवन गमले के पौधे के समान व्यतीत होता है, उसके पास लिखने को बहुत कम होता है तथा ऐसा व्यक्ति केवल अपने अंतर्मन की बातें ही लिख पाता है। साहित्य अकादेमी से सम्मानित प्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने हिन्दू कालेज में हिंदी विभाग के वार्षिकोत्सव 'अभिधा 2026' में कहा कि पहले पिता की नौकरी के स्थानांतरण एवं फिर पढ़ाई के कारण उन्होंने अनेक शहरों की धूल खाई, हवा देखी, पानी पिया, स्वाद चखा, भाषाएँ बोलीं, जिन्होंने उनके लेखन क्रम में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपनी चर्चित पुस्तकों कितने शहरों में कितनी बार तथा जीते जी इलाहाबाद की रचना प्रक्रिया के सूत्र बताते हुए कहा कि अपने जीवनानुभवों के साथ अपने परिवेश और आसपास के सामान्य जीवन को बारीकी से देखते हुए इनका सृजन हुआ है। कालिया ने युवाओं को अज्ञेय की मानक भाषा, जिसमें तत्सम शब्दों के साथ तर्क एवं अर्थ दोनों जीवन में खोल देते हैं, का अध्ययन करने को कहा। लेखन के लिए उन्होंने अनुभव, अनुभूति एवं कल्पना का सहारा लेने पर बल दिया। डायरी लेखन को लेखन की ओर आसानी से बढ़ने का साधन बताया क्योंकि डायरी में कभी-कभी ऐसे सुबोध वाक्य लिख जाते हैं जो आगे चलकर बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं। पुरानी डायरी पढ़ने पर उसमें अनेक नगीने मिलते हैं।
'लेखक से भेंट' शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम में ममता जी ने अपने लेखन सफर का प्रारंभिक विवरण भी साझा किया और बताया कि उन्होंने सर्वप्रथम 1955 में बच्चों की कहानियों से लेखन आरंभ किया। उसके पश्चात् अजमेर से छपने वाली प्रसिद्ध पत्रिक लहर को याद किया जिसके सम्पादक प्रकाश जैन ने उनकी कविताएँ लगातार छापी थीं। विद्यार्थी जीवन की शरारतों को स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि शरारतों से ही कहीं लेखन निकलता है। उन्होंने कहा कि लेखन में सबसे पहले एक केंद्रीय चरित्र खड़ा किया जाता है, जिसमें वे सभी बातें डाल दी जाती हैं जो लेखक को खटकीं या अच्छी लगीं।
हिंदू कॉलेज आने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उन्होंने यहाँ व्यतीत अपने विद्यार्थी जीवन की यादें भी साझा कीं। ममता जी ने हिंदी की प्रख्यात लेखिका मन्नू भंडारी एवं उनके पति राजेंद्र यादव, जो हिंदी के विख्यात लेखक एवं संपादक थे, के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाने के दिनों को भी स्मरण किया। कालिया ने श्रोताओं के विभिन्न सवालों के जवाब भी दिए और उन्हें खूब पढ़ने की सलाह दी।
इससे पहले हिंदी विभाग के प्रभारी प्रो बिमलेन्दु तीर्थंकर ने शाल ओढ़ाकर ममता जी का स्वागत किया एवं हिंदी साहित्य सभा तथा अभिधा के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि एक शताब्दी से भी अधिक समय से हिंदी साहित्य सभा अपनी गतिविधियों से नयी पीढ़ी में साहित्य के संस्कार दे रही है। विभाग के शिक्षक डॉ पल्लव ने ममता कालिया का परिचय देते हुए कहा कि उनके लेखन की मुख्य विशेषता यह है कि वे भारतीय मध्यवर्ग के सामान्य जनजीवन को अत्यंत कुशलता से अपने लेखन में चित्रित करती हैं। वे किसी विचारधारा या वाद से आक्रान्त होकर नहीं लिखतीं बल्कि खांटी जीवनानुभवों को प्रगतिशील दृष्टि से लेखन में जगह देती हैं। डॉ पल्लव ने कहा कि शहरनामा जैसी विधा को हिंदी में खड़ा करने में ममता जी का नाम लिया आजाएगा। शहर आधारित उनकी कृतियों का उल्लेख कर डॉ पल्लव ने कहा कि इनमें वे स्मृतियों की पुनर्रचना ही नहीं कर रही थीं बल्कि कोई चाहे तो इसे भी संस्मरण की ही कृति मान सकता है लेकिन यहाँ ममता जी का जोर उस शहर के चरित्र को ध्यान में रखकर अपने अनुभव लिखने पर रहा। 'जीते जी इलाहाबाद' इस रचना शृंखला की उच्चतम परिणति है जहाँ इलाहाबाद जैसे सांस्कृतिक शहर के चरित्र को लिखते हुए इसके भीतर वे अपने और अपने प्रियजनों के व्यक्तित्व की तलाश भी करती हैं। हिंदी में इस तरह की कृतियां बहुत अधिक नहीं मिलतीं और नयी शताब्दी में साहित्य की विधाओं में आ रहे बदलावों तथा अन्तर्क्रियाओं का भी श्रेष्ठ उदाहरण ममता जी का कथेतर लेखन बन गया है।
आयोजन के दूसरे भाग में अभिधा के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के पुरस्कार ममता कालिया के हाथों दिए गए। इनमें आशु भाषण में प्रथम रामजस कॉलेज की आकृति महाजन, द्वितीय श्री वेंकटेश्वर कॉलेज के पुलकित भार्गव और तृतीय रामजस कॉलेज के आदित्य राज को प्रमाण पत्र व नगद राशि दी गई। काव्य पाठ प्रतियोगिता में प्रथम लेडी श्रीराम कॉलेज की कृष्णा पाठक, द्वितीय दिल्ली स्कूल ऑफ़ जर्नलिज्म के अंकित तथा तृतीय दौलत राम कॉलेज की प्रत्यक्षा शर्मा को पुरस्कार दिए गए।
इससे पहले ममता जी ने हिंदी विभाग की भित्ति पत्रिका अभिव्यक्ति के नए अंक का लोकार्पण भी किया। वे उस कक्षा कक्ष में भी गईं जहाँ उन्होंने अपनी पढ़ाई के दिनों में कक्षाएँ ली थीं।
अंत में आभार प्रदर्शित करते हुए विभाग की वरिष्ठ शिक्षिका प्रो रचना सिंह ने कहा कि ममता कालिया जैसे उदार और सरल साहित्यकारों का सान्निध्य नयी पीढ़ी को हमारी कला संस्कृति के अधिक निकट ले जाने में समर्थ होगा। कार्क्रम का संयोजन बृजलाला और दीक्षा शर्मा ने किया। आयोजन में प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ डॉ वर्तिका नंदा साहित्य हिन्दू कालेज में राजनीति विभाग की प्रो सीमा दास, दर्शन शास्त्र के डॉ शुभम ओझा, हिंदी विभाग की डॉ नीलम सिंह, डॉ प्रज्ञा त्रिवेदी सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, विद्यार्थी और शोधार्थी उपस्थित रहे।
कैलाश सिंह राजपुरोहित
संयोजक, हिन्दी साहित्य सभा
हिन्दू कॉलेज, दिल्ली - 110007
