उज्जैन। डॉ. बाबा साहेब आम्बेडकर भारतीय संविधान के शिल्पी ही नहीं, आधुनिक भारत के निर्माताओं में से थे। भारत को ही नहीं विश्व को उनकी सबसे बड़ी देन भारतीय समाज का निर्भीक विश्लेषण, सामाजिक कुरीतियों को रेखांकित करना, संविधान की रचना, सामाजिक लोकतंत्र का आख्यान और सहज मानव के रूप में मानव की गरिमा स्थापित करना है। बाबा साहेब अपने श्रम, प्रतिभा तथा वैयक्तिक गुणों के कारण ही भारतीय इतिहास में अमिट अध्याय हैं। बाबा साहेब व्यावहारिक, सामाजिक, राजनीतिज्ञ तो थे साथ ही उनका अपना जीवन दर्शन था। उनके अपने धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विचार थे, जिससे वे भारत का गठन करना चाहते थे। उनकी नि:स्वार्थ सेवा द्वारा अनेकानेक वंचितों के मन में आशा, आत्मविश्वास की ज्योति जगाई। बाबा साहेब धुन के पक्के, उनकी ध्येय निष्ठा, प्रबल और संकल्प फौलादी थे। सामाजिक प्रयोजन के प्रति अटूट निष्ठा के कारण ही उनका व्यापक जनमत था और है। बाबा साहेब के व्यक्तित्व की नींव, उनकी प्रेरणा ने ही उन्हें डॉ. आम्बेडकर बनाया। उन्होंने जिन संस्कारों को ग्रहण किया उसे बहुगुणित कर अपने आचार व्यवहार में लाया। उन्होंने अपमान को अपनी प्रेरणा बनाई। उनका जीवन बताता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत हो, शिक्षा और स्वाभिमान के बल पर कोई भी व्यक्ति युग प्रवर्तक बन सकता है। उन्होंने महाड़ सत्याग्रह से सामाजिक समता और संविधान निर्माण से राजनीतिक नींव रखी।
उक्त विचार डॉ. आम्बेडकर पीठ द्वारा आयोजित डॉ. आम्बेडकर स्मृति व्याख्यान माला के अन्तर्गत डॉ. आम्बेडकर : प्रेरणा, प्रभाव, प्रदेय विषय पर भर्तृहरि छात्रावास में कुलानुशासक, आचार्य एवं अध्यक्ष, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कही।
प्रो. शर्मा ने कहा कि बाबा साहेब के प्रेरणास्रोत उनके माता-पिता, उनके तीन गुरु बुद्ध, कबीर, महात्मा फुले, उनके स्व अनुभव व विदेश में शिक्षा है। माता-पिता से उन्होंने शिक्षा का महत्व, बुद्ध से उन्होंने समता, करुणा, तर्क कि धर्म वही जो इंसान को इंसान माने, कबीर से उन्होंने पांखड का विरोध, निर्भय वाणी अर्थात् सच बोलो, चाहे अकेले पड़ जाओ, महात्मा फुले से शिक्षा ही मुक्ति है, स्त्री उद्धार अर्थात् स्कूल सबसे बड़ा मंदिर है। स्वअनुभव ने सिखाया अपमान को आग बनाओ राखी नहीं और विदेश की शिक्षा से ज्ञान ही सबसे बड़ा हथियार है। बाबा साहेब ने कहा मुझे उस मिट्टी से प्यार है, जिसने मुझे ठोकरें मारी क्योंकि उसने ही मुझे लड़ना सिखाया और इस प्रेरणा के प्रभाव ने जो नारा दिया, शिक्षित बनो, संगठित रहो संघर्ष करो। १९२७ महाड़ सत्याग्रह पीने के पानी का हक दिलाया और वंचित वर्ग को जगाया कि तुम भी इंसान हो। अस्पृश्यता का अंत करने के लिए संविधान के अनुच्छेद १७ से अस्पृश्यता कानून को अपराध बना दिया। आरक्षण, वोट का अधिकार, संविधान निर्माता, श्रम कानून, महिला प्रसूति अवकाश, आठ घंटे काम, पी.एफ. सब कुछ बाबा साहेब की देन। बाबा साहेब ने जो समाज राष्ट्र को दिया, वह अतुलनीय है। १४० करोड़ नागरिकों का धर्मग्रंथ कोर्ट से कलेक्टर तक सब इससे बंधे हैं। साहेब ने ही सिखाया कि लकीर को न पीटो बल्कि पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से निर्णय लो, विचार करो। उन्होंने कहा मैं उस धर्म को मानता जो स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व सिखाए। अंधविश्वास छोड़ो तर्क अपनाओ। नारी मुक्ति का रोड मैप-हिंदू कोड बिल के लिए मंत्री पद छोड़ दिया। आज बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ उसी की कड़ी है। 5 लाख लोगों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाकर यह सिद्ध कर दिया अपमान से जीने से बेहतर है स्वाभिमान से मरना। विकसित भारत का फार्मुला भी बाबा साहेब के विचार ही हैं शिक्षा+कौशल+अवसर भी समानता+राज्य का संरक्षण=सामाजिक लोकतंत्र।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने कहा कि बाबा साहेब प्रखर बुद्धि, विद्रोही व्यक्तित्व, प्रभावशाली वक्ता से भी बढ़कर महत्वपूर्ण क्रांतिदृष्टा थे। जिन्होंने मानव के अधिकारों, गौरव को उच्च मानवीय सभ्यता की मुख्य धारा में जोड़ा है। उनका सम्पूर्ण जीवन किसी विशेष क्षेत्र के निवासियों के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज की मुक्ति के लिए समर्पित था। विशेषत: उनका संदेश सम्पूर्ण विश्व के उन सभी स्थानों और स्थितियों के लिए मायने रखता है, जहाँ मनुष्य का मनुष्य के प्रति अन्याय एवं ऊंच-नीच का व्यवहार करता है। आज हम सबको समाज के प्रति संवेदनशील होने की आवश्यकता है, विशेषकर विद्यार्थियों को ग्रामीण परिवेश से अपने आस-पास के परिवेश से जुड़ने की, उन्हें पारिवारिक स्नेह, सहायता आदर देने की। तभी हम आज के दिन को सार्थक कर पाएंगे।
स्वागत भाषण देते हुए डॉ. आम्बेडकर पीठ के आचार्य प्रो. एस.के. मिश्रा ने कहा कि डॉ. आम्बेडकर सही अर्थों में बहुआयामी व्यक्तित्व के स्वामी थे। वह वकील, प्रोफेसर, शिक्षाविद्, समाज सुधारक, संसद सदस्य, संविधान-निर्माता, स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिक दलों के जन्मदाता, बौद्ध धर्म के समर्थक सभी कुछ थे। यह सब उन्होंने संभव किया विस्तृत गहन, गंभीर अध्ययन से, उनकी कुशाग्रबुद्धि और उदार मस्तिष्क से। बाबा साहेब एक ऐसा संसदीय प्रजातंत्र के साथ-साथ ऐसा भारतीय समाज चाहते थे, जिसमें व्यक्तित्व की गरिमा, सम्मान बना रहे।
कार्यक्रम का संयोजन, संचालन डॉ. आम्बेडकर पीठ की सहायक प्राध्यापक डॉ. निवेदिता वर्मा ने किया। इस अवसर पर पं.ज.ने. व्यवसायिक प्रबंध संस्थान के निदेशक डॉ. धर्मेन्द्र मेहता ने भी विचार व्यक्त किए। आई.क्यू.ए.सी. के निदेशक डॉ. डी.डी. बेदिया ने आभार माना।
इस अवसर पर शुभम शर्मा का काव्यपाठ हुआ। डॉ. राज बोरिया, आकाशवाणी के लखन मालवीय, अवनीश गिरी, विनय सिंह, हरिकेश तिवारी, निशांत कुशवाह, अर्पण साहू, अभिजीत सिंह, अंकुर टिटवानिया विशेष रूप से उपस्थित थे।
डॉ. निवेदिता वर्मा
