लेखक
डॉ. अशोक कुमार गदिया
चेयरमैन, मेवाड़ यूनिवर्सिटी, चित्तौड़गढ़
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पिछले कुछ वर्षों में देश में मज़हब कट्टरता और नफरत की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। समाज और राष्ट्र दोनों के लिए यह गंभीर चिंता की बात है। मज़हब आधारित नफरत जहां देश के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर रही है, वहीं यह देश की सुरक्षा के लिए बड़े खतरे के रूप में सामने आने लगी है। विघटनकारी ताकतें नहीं चाहती कि देश में समरसता का माहौल रहे और देश विकास के रास्ते पर तेजी से चले। इसलिए आज इस बात पर गंभीरता से विचार करने वक्त है कि ऐसी विघटनकारी ताकतों को हम कैसे परास्त करें, ताकि हमारी भावी पीढ़ियों को नफरत का दंश न झेलना पड़े।
हाल के वर्षों में देश के कई राज्यों में मज़हबी नफरत व उन्माद की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। खासतौर से उत्तर भारत में ये ज्यादा देखने को मिला है। इन्हें देख कर लगता है कि अगर मज़हबी कट्टरता और उन्माद का यह सिलसिला ऐसे ही बढ़ता रहा और इसे रोकने के लिए सरकारों और समाज ने गंभीर प्रयास नहीं किए तो देश का धर्मनिरपेक्ष ढांचा और सामाजिक ताना-बाना ध्वस्त होते देर नहीं लगने वाली।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। यह देश फूलों के एक गुलदस्ते की तरह है। ऐसा गुलदस्ता जिसमें अलग-अलग रंगों और सुगंधों वाले फूल एक साथ रहते हैं और आसपास के वातावरण को सुगंधित करते हैं। यही बात हमारे देश और समाज के संदर्भ में खरी उतरती है। भारत में अलग-अलग धर्म, बोलियों, भाषा, संस्कृति आदि को मानने वाले बसते हैं। लेकिन मज़हबी नफरत सामाजिक समरसता वाले इस परिवेश में जहर घोलने का काम कर रही है। आज हमारे समक्ष इसी से निपटने की चुनौती है।
देखा जाए तो पिछले कुछ वर्षों में देश में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में तो कमी आई है। यह एक सुखद और सकारात्मक संकेत है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि दूसरी ओर मज़हबी कट्टरता और नफरत रूपी बुराई पैर पसारने लगी है। इस तरह के उन्माद के नतीजे हमारे सामने हैं। कट्टरपंथी विचारधारा वाले नेता, धार्मिक नेता विभाजनकारी बयान देने में जरा नहीं हिचकिचा रहे। उदाहरण के लिए- "केवल हम ही रहेंगे और केवल वही रहेंगे जो हमारा अनुसरण करेंगे।" आखिर ये सब क्या है? क्या हम दुनिया के समक्ष उस भारत की यही छवि पेश करना चाहते हैं जिसने हमेशा दुनिया को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है और शांति एवं सद्भाव का संदेश दिया है?
चाहे विगत हो या फिर वर्तमान, एक बड़ी गलती बार-बार दोहराई जा रही है। वह यह कि कुछ व्यक्तियों के कृत्यों के आधार पर पूरी कौम या जाति का न्याय करने का चलन। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर समाज, धर्म या जाति में अगर अत्याचारी लोग हुए हैं, तो संत भी हुए हैं। अगर स्वार्थी तत्व हुए हैं तो शहीद भी हुए हैं। तो फिर किसी एक व्यक्ति विशेष के कृत्यों के आधार पर पूरे समुदाय या जाति को दोषी ठहराना कैसे उचित ठहराया जा सकता है? यह प्रवृत्ति ऐसा घातक रूप लेती जा रही है, जिसे कहीं से भी न्यायसंगत और विवेकपूर्ण नहीं ठहराया जा सकता। न ही इससे किसी राष्ट्र के विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। ऐसा करना तो मानवता की भावना के प्रतिकूल है।
इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि जब तक हम धर्म, जाति और क्षेत्रवाद पर आधारित संकीर्ण मानसिकता से ऊपर नहीं उठेंगे, तब तक हम एक समृद्ध और खुशहाल समाज की कल्पना नहीं कर सकते। और अगर समाज खुशहाल नहीं होगा तो देश में शांति एवं सद्भाव कैसे बना रह पाएगा! दुख तो यह देख कर होता है सिर्फ अलग-अलग धर्मों ही नहीं, बल्कि एक ही धर्म के भीतर भी सैकड़ों जातियां विद्यमान हैं। यह जातिवाद हमारी राजनीति और सत्ता का एक प्रमुख हथियार बन गया है। यदि हम धर्म और जाति के दुष्चक्र से मुक्त नहीं हुए, तो एक विकसित भारत और सभ्य समाज का सपना कभी साकार नहीं होगा।
हमें याद रखना चाहिए कि सबसे पहले तो हम भारतीय नागरिक हैं और एक सच्चे राष्ट्रवादी नागरिक के रूप में हमारा पहला कर्तव्य किसी भी तरह के कट्टरवाद के प्रसार को रोकना है। यह तभी संभव होगा जब हम "हम भारतीय हैं" की भावना को आत्मसात करेंगे। ऐसा करके हम निश्चित रूप से अपने अधिकांश मतभेदों को दूर कर सकते हैं। यह कतई असंभव नहीं है।
जरा मध्यकालीन भारत और ब्रिटिश काल की परिस्थितियों पर गौर करें। उस दौरान हुए भारत पर जो आक्रमण हुए और अत्याचारों का लंबा सिलसिला चला, उनका मकसद किसी धर्म विशेष का प्रचार करने या मज़हबी नफरत फैलाने के बजाय अपने साम्राज्य का विस्तार करना ज्यादा था। मध्यकाल में भारत सदियों तक मुगलों का गुलाम रहा। फिर देश पर डेढ़-दो सौ साल अंग्रेजों का शासन रहा, जिन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को बांटने की नीति अपनाई और इसमें वे सफल भी हो गए। सच में देखा जाए तो भारत पर आक्रमण कर राज करने वाले मुस्लिम शासक वास्तव में इस्लाम के अनुयायी तो थे ही नहीं, क्योंकि इस्लाम तो कभी भी किसी भी प्रकार के हमले या हिंसा का समर्थन नहीं करता और न ही मानवता के खिलाफ कोई संदेश देता है। ऐसे में यह कैसे कहा जा सकता है कि भारत पर आक्रमण करने वाले मुस्लिम शासक इस्लाम के सच्चे अनुयायी थे। बल्कि सच तो यह है कि ऐसे आक्रमणकारी तो पक्के तौर पर इस्लाम-विरोधी थे।
लेकिन आज इन आक्रमणकारियों को आदर्श और प्रेरणा का स्रोत माना जा रहा है। इन्हें मानने वाले समाज में विभाजन पैदा करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। जबकि हकीकत तो यह है कि ऐसे लोगों का इस्लाम की शिक्षाओं दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। अगर वे इस्लाम धर्म की शिक्षाओं पर चलते तो क्या आक्रमणकारी-अत्याचारी बनते, देश को विभाजित करने का कुचक्र रचते? शायद नहीं।
मज़हबी कट्टरता और नफरत चुनावों और त्योहारों के दौरान तो और भी गंभीर रूप ले लेती है। वोट और समर्थन हासिल करने के लिए भड़काऊ भाषण देने में हमारे राजनेता जरा शर्म-संकोच महसूस नहीं करते। सोशल मीडिया पर जिस तरह के भड़काऊ वीडियो और रीलें चलती हैं, उन्हें देख अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह नफरत देश को किस ओर ले जा रही है। समुदायों के बीच नफरत भड़काने वाले नारे और उग्र भाषण कभी भी एक सभ्य और सहिष्णु समाज की निशानी नहीं हो सकते। और इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि समाज में ऐसे कट्टरपंथियों और उपद्रवियों का महिमामंडन होता है।
भारत प्राचीन काल से ही महान विभूतियों की भूमि रहा है। भगवान महावीर और बुद्ध से लेकर स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, महर्षि अरविंद, महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सर सैयद अहमद खां आदि सभी महान व्यक्ति इसी देश में जन्मे। इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि महाराणा प्रताप की सेना में हकीम खान उनके भरोसेमंद सेनापति थे, जिन्होंने हल्दीघाटी के युद्ध में अपने प्राणों का बलिदान दिया था। छत्रपति शिवाजी की सेना में भी दौलत खान और इब्राहिम खान जैसे वीर मुस्लिम सैनिक थे। लेकिन शिवाजी महाराज ने कभी किसी मज़हबी संप्रदाय को ठेस नहीं पहुंचाई। इसके अलावा रानी लक्ष्मीबाई के सबसे विश्वस्त सेनापति गुलाम गौस खान थे, जो झांसी की रक्षा करते हुए शहीद हो गए थे। रहीम खान कृष्ण के कट्टर भक्त थे। और, क्या हम कबीर को हिंदू-मुसलमान के खांचे में कभी बांट सकते हैं? जब हिंदू और मुसलमान सदियों से भारत में साथ-साथ रहते आए हैं, तो आज फिर यह मज़हबी नफरत कहां से आ गई?
बात यहीं खत्म नहीं होती। अंग्रेजों से देश को आज़ाद कराने के लिए करीब डेढ़ सौ साल तक चले स्वतंत्रता संघर्ष में हिंदू और मुसलमान दोनों ने बराबर योगदान दिया। यह वह दौर था जब कट्टरता लगभग न के बराबर थी। आम लोग मंदिर-मस्जिद जैसे विवादों की कल्पना भी नहीं कर सकते थे। अगर हम महात्मा गांधी की बात की बात करते हैं तो उनके साथ क्या हम सीमांत गांधी खान अब्दुल गफ्फार खां को कभी भूल पाएंगे? लेकिन ऐसा लगता है कि हम इन सच्चे देशभक्तों के आदर्शों और शिक्षाओं को भूल कर मज़हबी कट्टरता और नफरत के जाल में फंसते जा रहे हैं। महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, रहीम और कबीर- ये सभी किसी विशेष धर्म के व्यक्ति नहीं, बल्कि ये सभी मानवीय चेतना और मज़हबी सद्भाव की भावना के प्रतीक हैं।
आज यह गंभीर सवाल सबके सामने है कि समाज को मज़हबी नफरत और कट्टरता की बेड़ियों से कैसे मुक्त कराया जाए। अगर सभी धर्मों के विद्वान, प्रबुद्धजन और नौजवान मिल कर सार्थक पहल करें तो यह मुश्किल नहीं है। यदि समुदायों से लेकर सरकार तक के स्तर पर ऐसी नेक पहल की जाए और ईमानदारी एवं सच्ची भावना से आगे बढ़ा जाए, तो मज़हबी कट्टरता की इस बुराई से छुटकारा पाना असंभव नहीं है। ऐसी पहलों से सार्थक परिणाम हासिल हो सकते हैं।
इस दिशा में पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कदम शिक्षा के माध्यम से उठाया जा सकता है। बचपन से ही बच्चों में एक-दूसरे के धर्मों के प्रति सम्मान के मूल्यों को विकसित करना चाहिए। इसके लिए प्राथमिक स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा में सभी धर्मों के बारे में सटीक और तथ्यात्मक जानकारी देना शुरू करना होगा। चाहे विद्यालय हों या मदरसे, सभी को मज़हबों के बारे में सही जानकारी देनी होगी। मज़हबों की सही समझ बच्चों को सही दिशा दिखा सकती है। ठीक इसी तरह के प्रयास सामुदायिक स्तर पर भी किए जाने चाहिए। सभी धर्मों के नेताओं, विद्वानों और बुद्धिजीवियों को एक साथ आकर यह तय करना चाहिए कि मज़हबी कट्टरता का विरोध करने और एक-दूसरे के धर्मों और संस्कृतियों के प्रति समझ और सम्मान को बढ़ावा देने वाले विचारों के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान कैसे चलाया जाए।
इक्कीसवीं सदी का एक चौथाई वक्त बीत चुका है। जहां भारत विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होकर एक विकसित देश बनने का सपना देख रहा है, वहीं कट्टरपंथी और राष्ट्र-विरोधी ताकतें इसे कमजोर करने में लगी हैं। इसलिए ऐसी ताकतों के चंगुल से देश को निकालना होगा। यहां भगवान बुद्ध की एक शिक्षा का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। बुद्ध ने कहा था कि घृणा को घृणा से नहीं जीता जा सकता। इसे हमें आज के संदर्भ में समझना होगा। भारत "वसुधैव कुटुंबकम" के सिद्धांत में विश्वास रखता है, जिसका अर्थ है कि संपूर्ण विश्व एक परिवार है। यह सिद्धांत विश्व में एकता, पारस्परिक सहयोग, सहानुभूति और भाईचारे को बढ़ावा देता है और मानवता को राष्ट्रवाद, धर्म या जाति से ऊपर रखता है।
हमें ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना है जिसकी संस्कृति, विरासत, संघर्ष और भविष्य सब एक समान हों। भारत तभी महान बनेगा, जब वह सबका होगा और यह तभी संभव होगा जब हम अपने मन से मज़हबी कट्टरता को दूर कर पाने में कामयाब हो पाएंगे।
