पुरुष दिवस हर साल 19 नवंबर को मनाया जाता है। इस दिन पुरुषों के योगदान, जिम्मेदारियों, स्वास्थ्य, समाज में उनकी भूमिका और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर ध्यान दिया जाता है। पुरुष दिवस आ गया है।हाँ, वही दिन जिसे याद करने की फुरसत किसी को नहीं होती। बाक़ी दिनों में तो पुरुष “प्रधान” कहलाता है, लेकिन इस दिन उसके हिस्से सिर्फ़ दो चीज़ें आती हैं, एक पोस्टर और एक हास्य–व्यंग्य! सो, आइए इस अवसर पर पुरुषों के महान, अतुलनीय संघर्षों पर थोड़ा व्यंग्य -रस छिड़कते हैं। कहने को पुरुष घर का मुखिया है, मगर टीवी का रिमोट तक उसकी अनुमति से ज्यादा परिवार की “मन: स्थिति” से चलता है। कभी सोफ़ा उसकी शरणस्थली होता था, आज वही सोफ़ा "समझोता" कहलाता है, कब बैठना है, कब हटना है, सब आदेश पर निर्भर। बाहर ऑफिस में बॉस डांटता है, घर आकर पत्नी। दफ्तर में ‘डेडलाइन’ होती है, घर में ‘लाइन पर रहना’। जो पुरुष इस दोहरी मार को सह ले, वह असली सुपरहीरो ही है। लेकिन पुरुष रोए नहीं… ऐसा समाज का आदेश है। चाहे ईएमआई दबाए, चाहे पेट्रोल- डीजल की कीमतें, चाहे बाल झड़ें, चाहे प्रमोशन लटक जाए, रोया तो मर्द नहीं! पुरुष दिवस: वह दिन है जब पुरुष से पूछा जाता है, तुम्हारा संघर्ष क्या है? समाज उत्सुकता से पूछता है—“पुरुषों की क्या दिक्कत है?” मानो पुरुषों का जीवन सुबह की व्हाइट ब्रेड जितना आसान हो। किसी ने कभी पूछा? जिसे 70% कमाई EMI में देनी पड़ती है, जिसे साल में 4 त्यौहारों पर नए कपड़े मिलें, जबकि पत्नी और बच्चों के लिए 12-12 सेट आते हैं, जिसे अपनी पसंद से नहीं, परिवार की ज़रूरतों से खरीदारी तय करनी होती है, उसके दर्द पर शोध होना चाहिए! लेकिन पुरुष दिवस पर भी उससे यही उम्मीद, “मुस्कुराओ और सेलिब्रेट करो।” कैसे? किसके साथ? कब? क्योंकि इस दिन छुट्टी तक नहीं मिलती! पुरुष की लाइफ: डाउनलोडिंग में तेज, अपग्रेडिंग में स्लो। और समाज ने पुरुष को बचपन से ही सिखाया, रोना मत, शिकायत मत करना, थकान मत दिखाओ, कम कमाओ, ज़्यादा चलाओ, घर की मरम्मत, गाड़ी की पंक्चर, रिश्तेदारों के फोन सब तुम्हारी ड्यूटी, ये मल्टीटास्किंग महिलाएं नहीं, और ऊपर से उम्मीद ये कि वह रोमांटिक भी हो, कूल भी हो, कमाऊ भी हो और समर्पित भी रहो। क्या कोई मानव इतना कर सकता है? शायद नहीं। लेकिन पुरुष कर लेता है, क्योंकि समाज ने उसे चुपचाप सहने की ट्रेनिंग दी है। पुरुष दिवस का जश्न: लाइक्स मिले तो ठीक, वरना रात को वही दाल–रोटी। पुरुष दिवस पर सोशल मीडिया पर चार पोस्टें आती हैं- “हैप्पी मेन्स डे” वाली एक फोटो, “मर्द को भी दर्द होता है” वाला उद्धरण, एक आधी-अधूरी कविता और सबसे खास- “असल में पुरुष दिवस कोई मनाता नहीं।” पुरुष बेचारा यह पूरा तमाशा देखकर पोस्ट लाइक कर देता है। कमेंट में दिल भी डाल देता है। और फिर वही दिनचर्या- कार्ड स्वाइप करो, टेबल पोंछो, गाड़ी भरवाओ, लाइट ठीक करो, किसी को इम्प्रेस करो। व्यंग्य का सार: पुरुष न महान, न बेचारा-बस इंसान है। पुरुष दिवस पर यह व्यंग्य किसी पुरुष का मज़ाक उड़ाने के लिए नहीं, बल्कि यह बताने के लिए है कि पुरुषों को भी भावनाएँ, थकान, तनाव और संघर्ष होते हैं। हँसते- खेलते वह कितना कुछ सहता है, यह अक्सर कहा नहीं जाता, सुना तो बिल्कुल नहीं जाता। पुरुष को भी तारीफ़ चाहिए, थोड़ी राहत चाहिए, थोड़ी समझ चाहिए, और कभी–कभी यह एहसास भी कि वह भी महत्त्वपूर्ण है। इसलिए…सभी पुरुषों को पुरुष दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! आज ही नहीं, रोज़- पुरुष को इंसान समझिए।
