सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी भवन का भरभराकर गिरना केवल एक इमारत का हादसा नहीं है। यह दिल्ली-एनसीआर के उस शहरी विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है, जिसमें आवासीय मकान पीजी बन जाते हैं, स्वीकृत नक्शे से अधिक मंजिलें खड़ी हो जाती हैं, बेसमेंट का उपयोग बदल जाता है और सरकारी अथवा ग्रीन बेल्ट की जमीन पर कब्जे धीरे-धीरे स्थायी निर्माण में बदल जाते हैं। सत्य निकेतन में सात लोगों की मौत और पांच लोगों के घायल होने के बाद यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या प्रशासन अवैध निर्माण को हादसे से पहले पहचानता है या हादसे के बाद जागता है?
सत्य निकेतन-चेतावनी नहीं, आईना
7 सितंबर को दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में लगभग 50-55 वर्ष पुरानी पांच मंजिला इमारत अचानक ढह गई। इसमें मुख्यतः विद्यार्थी रहते थे। बचाव अभियान में 12 लोगों को मलबे से निकाला गया, जिनमें सात की मृत्यु हो गई और पांच घायल हुए। भवन में निर्माण-मरम्मत का काम चल रहा था और बेसमेंट में भी काम होने की जानकारी सामने आई है। एमसीडी की प्रारंभिक जांच के अनुसार भवन के पास स्वीकृत नक्शा नहीं था, बेसमेंट अनधिकृत था, फायर एनओसी नहीं थी और पांचवीं मंजिल भी नियमों के अनुरूप स्वीकृत नहीं थी। सबसे चैंकाने वाली बात यह है कि इस भवन को इस साल के मानसून-पूर्व सर्वे में खतरनाक घोषित भवनों की सूची में शामिल नहीं किया गया था। दिल्ली में 2020 से 2024 के बीच ढांचे गिरने से लगभग 170 मौतें दर्ज हुईं। इसलिए सत्य निकेतन को एक अलग-थलग दुर्घटना मानना मुश्किल है।
दिल्ली में कार्रवाई के आंकड़े भी कम गंभीर नहीं
सत्य निकेतन जैसी घटनाओं के बीच दिल्ली में अवैध निर्माण के विरुद्ध अभियान के आंकड़े बताते हैं कि समस्या कितनी व्यापक है। जून 2026 में एमसीडी ने एक अभियान में 217 अनधिकृत ढांचे गिराए और 237 संपत्तियां सील कीं। इसके अलावा 330 कारण बताओ नोटिस, 151 सीलिंग नोटिस और 91 ध्वस्तीकरण आदेश जारी किए गए। राजस्व विभाग ने केवल 5 से 15 जून के बीच दिल्ली में 773 स्थानों का निरीक्षण किया। पश्चिमी दिल्ली में 165, दक्षिण दिल्ली में 93, उत्तर दिल्ली में 89 और दक्षिण-पश्चिम दिल्ली में 70 निरीक्षण हुए। इन निरीक्षणों में अनधिकृत निर्माण, अग्नि सुरक्षा और भूमि-उपयोग से जुड़े उल्लंघन मिले। लेकिन सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर कार्रवाई करनी पड़ रही है, तो ये निर्माण बनते समय दिखाई क्यों नहीं दिए?
पीजी संस्कृति ने बढ़ाया खतरा
दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के आसपास निजी पीजी की मांग बहुत अधिक है। इसी मांग ने कई आवासीय इलाकों में मकानों को बहुमंजिला पीजी में बदलने का रास्ता खोला है। सत्य निकेतन में जिस इमारत के गिरने से सात जानें गईं, उसके आसपास भी कई भवन पीजी के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। जांच में आसपास के कुछ पीजी में संकरे रास्ते, सीमित प्रवेश-निकास और बिजली व्यवस्था से जुड़े सुरक्षा सवाल सामने आए हैं। यही स्थिति गुरुग्राम में भी दिखाई देती है। वहां 453 पीजी चिन्हित किए गए हैं और 18 को सील किया जा चुका है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान चार पीजी भवनों के 181 कमरे सील किए गए और 29 अवैध व्यावसायिक इकाइयों पर भी ताले लगाए गए। यानी सत्य निकेतन का सवाल केवल दिल्ली का नहीं, बल्कि पूरे एनसीआर के पीजी मॉडल का सवाल बन चुका है।
गुरुग्राम-घर से पीजी और पीजी से व्यावसायिक परिसर
गुरुग्राम में कई आवासीय क्षेत्रों में अतिरिक्त मंजिलों और स्टिल्ट पार्किंग के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद है। डीएलएफ फेज-3 में कार्रवाई के दौरान ऐसे भवन भी मिले जिनमें स्वीकृत सीमा से अतिरिक्त मंजिलें बनाई गई थीं। एक अभियान में 13 अनधिकृत निर्माण ध्वस्त किए गए और 18 भवन सील किए गए। साथ ही लगभग डेढ़ एकड़ एमसीजी जमीन कब्जामुक्त कराई गई। यहां सवाल केवल भवन का नहीं है। जब आवासीय प्लॉट पर अतिरिक्त मंजिल बनती है, दर्जनों लोग रहने लगते हैं और नीचे व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं तो सड़क, पार्किंग, सीवर, पानी और अग्नि सुरक्षा सभी पर दबाव बढ़ता है।
गाजियाबाद-हिंडन के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां
गाजियाबाद की तस्वीर और भी चिंताजनक है। प्रशासन के अनुसार हिंडन नदी के किनारे 258 अवैध कॉलोनियां बसी हुई हैं। जिलाधिकारी ने यमुना और हिंडन नदी क्षेत्रों में सरकारी जमीनों पर हुए अतिक्रमण का सर्वे कराकर कार्रवाई के निर्देश दिए हैं। यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं है। नदी के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण होने का सीधा असर जलनिकासी और बाढ़ के जोखिम पर पड़ता है। जुलाई 2026 में भी हिंडन के बाढ़ क्षेत्र में नए मकान, पशुशालाएं, शौचालय और अन्य निर्माण दिखाई देने की रिपोर्ट सामने आई। यानी जिस जमीन को प्राकृतिक जल प्रवाह और बाढ़ नियंत्रण के लिए खुला रहना चाहिए, वहां धीरे-धीरे आबादी और निर्माण खड़ा हो रहा है।
नोएडा-5,903 करोड़ की जमीन कब्जामुक्त
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अतिक्रमण का पैमाना जमीन के आंकड़ों से समझा जा सकता है। गौतमबुद्धनगर पुलिस के अनुसार 2025 से जून 2026 तक 13 लाख 25 हजार 960 वर्ग गज सरकारी और प्राधिकरण की जमीन अतिक्रमण से मुक्त कराई गई। इसकी अनुमानित कीमत 5,903 करोड़ 95 लाख रुपये से अधिक बताई गई है। इसमें सेंट्रल नोएडा 8,89,127 वर्ग गज, ग्रेटर नोएडा 4,21,833 वर्ग गज, नोएडा 15,000 वर्ग गज जमीन शामिल है। कई मामलों में भूमाफियाओं ने सरकारी जमीन पर बाउंड्रीवाल, निर्माण या अवैध प्लॉटिंग की थी और कुछ मामलों में एफआईआर भी दर्ज हुई। यह आंकड़ा बताता है कि नोएडा में मामला केवल सड़क या फुटपाथ के कब्जे तक सीमित नहीं है। यहां हजारों करोड़ रुपये मूल्य की जमीन भी अतिक्रमण के निशाने पर रही है।
फरीदाबाद-ग्रीन बेल्ट भी सुरक्षित नहीं
फरीदाबाद में भी नगर निगम, एफएमडीए और एचएसवीपी को लगातार अतिक्रमण हटाने के अभियान चलाने पड़ रहे हैं। पिछले एक वर्ष में शहर के अलग-अलग क्षेत्रों में हजारों अस्थायी और स्थायी अतिक्रमण हटाए जाने की जानकारी सामने आई है। समस्या की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एफएमडीए ने सेक्टर-88 की ग्रीन बेल्ट और सरकारी जमीन को दोबारा कब्जे से बचाने के लिए लगभग 1.53 करोड़ रुपये की फेंसिंग परियोजना शुरू की है। प्रशासन को कई स्थानों पर एक ही जगह बार-बार अतिक्रमण हटाना पड़ता है। ग्रीन बेल्ट पर कब्जा केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है। इससे बारिश के पानी की निकासी भी प्रभावित होती है और जलभराव बढ़ सकता है।
क्या मास्टर प्लान की धज्जियां उड़ रही हैं?
इस प्रश्न का उत्तर अब टालना मुश्किल है। दिल्ली की सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित मॉनिटरिंग कमेटी ने जुलाई 2026 में ही आवासीय परिसरों में मिश्रित उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों के कारण अग्नि सुरक्षा नियमों, यूबीबीएल-2016 और मास्टर प्लान-2021 के उल्लंघन पर रिपोर्ट दर्ज की है। अर्थात समस्या केवल यह नहीं कि किसी ने सरकारी जमीन पर कब्जा कर लिया। असली समस्या यह है कि आवासीय मकान पीजी बन गया। पीजी बहुमंजिला हो गया। बेसमेंट का उपयोग बदल गया। पार्किंग व्यावसायिक गतिविधि में चली गई। ग्रीन बेल्ट पर निर्माण हो गया। नदी के बाढ़ क्षेत्र में कॉलोनी बस गई। इन सबका संयुक्त परिणाम शहर की नियोजित संरचना को कमजोर करता है।
सबसे बड़ा सवाल, प्रशासन पहले क्यों नहीं जागता
सत्य निकेतन हादसे के बाद भवन मालिक परिवार के तीन सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और पांच एमसीडी अधिकारियों को निलंबित किया गया। सभी पीजी और हॉस्टल भवनों के संरचनात्मक ऑडिट की मांग भी तेज हुई है। लेकिन असली कसौटी यही होगी कि क्या यह कार्रवाई हादसे के बाद तक सीमित रहती है या व्यवस्था बदलती है? दिल्ली-एनसीआर में एक साझा डिजिटल रजिस्टर होना चाहिए, जिसमें प्रत्येक पीजी, गेस्ट हाउस और बहुमंजिला आवासीय भवन की स्थिति दर्ज हो, स्वीकृत नक्शा, वास्तविक मंजिलें, फायर एनओसी, संरचनात्मक ऑडिट, भूमि उपयोग और कार्रवाई की स्थिति।
कब्जे का इलाज बुलडोजर नहीं, रोकथाम है
सत्य निकेतन की सात मौतें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि शहरों में अवैध निर्माण आखिर बनता कैसे है। 13 लाख वर्ग गज जमीन कब्जामुक्त कराने के बाद भी यदि नए कब्जे होते रहें, 258 अवैध कॉलोनियां नदी किनारे बनी रहें और 453 पीजी में से 18 को हादसे के डर के बीच सील करना पड़े, तो समस्या केवल अतिक्रमणकारियों की नहीं है। यह निगरानी और नियोजन की भी समस्या है। दिल्ली-एनसीआर को अब केवल यह बताने की जरूरत नहीं कि कितने कब्जे हटाए गए। उसे यह बताना होगा कि कितने कब्जे बनने से पहले रोके गए, कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, कितने अवैध पीजी बंद हुए और कितनी जानें बचाई गईं। क्योंकि सत्य निकेतन के मलबे के नीचे केवल सात लोग नहीं दबे, उसके नीचे हमारी शहरी नियोजन व्यवस्था की कई कमजोरियां भी उजागर हुई हैं।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
