भारत का हिमालय केवल बर्फ से ढके पहाड़ों की श्रृंखला नहीं है। वह देश की नदियों का उद्गम, करोड़ों लोगों के जीवन का आधार, जैव-विविधता का भंडार और जलवायु-संतुलन की एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक व्यवस्था है। लेकिन पिछले एक दशक से हिमालय बार-बार हमें चेतावनी दे रहा है। कहीं बादल फट रहे हैं, कहीं पहाड़ दरक रहे हैं, कहीं ग्लेशियल झीलें फैल रही हैं और कहीं अचानक आने वाली बाढ़ पूरे गांव और सड़कें बहा ले जा रही है। हाल की नेपाल त्रासदी ने इस चेतावनी को फिर बेहद भयावह बना दिया है। सबसे पहले 2013 की केदारनाथ त्रासदी को याद करना जरूरी है। जून 2013 में उत्तराखंड में 14 से 18 जून के बीच असाधारण वर्षा हुई। सामान्य 71.3 मिलीमीटर के मुकाबले 385.1 मिलीमीटर वर्षा दर्ज हुई, अर्थात सामान्य से लगभग 440 प्रतिशत अधिक। सरकारी आकलन में 169 लोगों की मृत्यु और 4,021 लोगों के लापता होने की सूचना थी, जिन्हें बाद में मृत मानने की स्थिति बनी। 50 हजार करोड़ रुपये के आसपास बुनियादी ढांचे के नुकसान का अनुमान लगाया गया। केदारनाथ, गौरीकुंड, मंदाकिनी और अलकनंदा घाटियां सबसे अधिक प्रभावित हुईं। केदारनाथ ने हमें बताया था कि पहाड़ में प्रकृति की छोटी-सी अतिरिक्त मार भी कितनी बड़ी त्रासदी बन सकती है। लेकिन उसके बाद के वर्षों में घटनाओं का सिलसिला थमा नहीं।
लगातार बढ़ता खतरा
उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से लेकर नेपाल और तिब्बत तक हिमालयी क्षेत्र में भूस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और ग्लेशियल झीलों के फटने की घटनाएं लगातार सामने आई हैं। उत्तराखंड में 2015 से 2024 के बीच 4,600 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए और इनमें कम से कम 316 लोगों की मृत्यु हुई। पिथौरागढ़ में अकेले लगभग 100 मौतें दर्ज हुईं। फरवरी 2021 में चमोली की ऋषिगंगा-धौलीगंगा घाटी में हुई त्रासदी ने एक नया खतरा सामने रखा। रौंती क्षेत्र से भारी मात्रा में चट्टान और बर्फ नीचे आई और अचानक जलप्रवाह ने ऋषिगंगा तथा धौलीगंगा घाटियों को अपनी चपेट में ले लिया। दो जलविद्युत परियोजनाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं और 200 से अधिक लोगों की मृत्यु या लापता होने की सूचना सामने आई। यह घटना इस बात का प्रमाण थी कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर, चट्टान, पानी और मानव निर्माण मिलकर कितनी भयावह स्थिति पैदा कर सकते हैं। अक्टूबर 2023 में सिक्किम में दक्षिण ल्होनाक झील के फटने से तीस्ता नदी में अचानक भीषण बाढ़ आई। सरकारी स्थिति रिपोर्ट के अनुसार सिक्किम में 42 शव बरामद किए गए, तीस्ता नदी के क्षेत्र में पश्चिम बंगाल पुलिस ने 62 अज्ञात शव बरामद किए और 77 लोग लापता थे। 88,400 लोग प्रभावित हुए, 2,563 लोगों को बचाया गया और 5,665 लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। यह केवल बाढ़ नहीं थी। यह ग्लेशियल झील के फटने से आई बाढ़ थी। दक्षिण ल्होनाक झील का आधे से अधिक पानी अचानक निकल गया था। यही वह खतरा है जो आने वाले वर्षों में हिमालय के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन सकता है।
ग्लेशियरों की बदलती दुनिया
भारतीय हिमालय के ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव अब केवल वैज्ञानिक शोध का विषय नहीं रह गए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर औसतन लगभग 14.9 मीटर प्रतिवर्ष पीछे हट रहे हैं। गंगा बेसिन में यह औसत लगभग 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र बेसिन में लगभग 20.2 मीटर प्रतिवर्ष है। 1975 से 2023 तक भारतीय हिमालयी ग्लेशियरों में संचयी बर्फ-द्रव्यमान हानि का अनुमान लगभग 26 मीटर जल-समतुल्य लगाया गया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के उपग्रह अध्ययन ने भी गंभीर संकेत दिए हैं। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 हिमनदीय झीलों का अध्ययन किया गया। इनमें 676 झीलों का उल्लेखनीय विस्तार पाया गया। इन 676 में 130 झीलें भारत में हैं, 65 सिंधु नदी क्षेत्र में, 7 गंगा क्षेत्र में और 58 ब्रह्मपुत्र क्षेत्र में। इनमें 601 झीलों का आकार दोगुने से भी अधिक बढ़ चुका था। हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी की एक हिमनदीय झील का आकार 1989 से 2022 के बीच 36.49 हेक्टेयर से बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया, यानी लगभग 178 प्रतिशत की वृद्धि। इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि हर बढ़ती झील कल ही फट जाएगी। लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि जो खतरे पहले छोटे और दूर थे, वे अब बड़े और अधिक संवेदनशील हो रहे हैं।
हिमाचल की लगातार त्रासदियां
2023 में हिमाचल प्रदेश ने अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन की भयावह स्थिति देखी। राज्य सरकार द्वारा केंद्र को दी गई रिपोर्ट के अनुसार 2023-24 में जल-मौसम संबंधी आपदाओं में 556 लोगों की जान गई, 21,506 पशु मारे गए और 15,792 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2024-25 में 408 लोगों की मृत्यु हुई और 1,089 मकान क्षतिग्रस्त हुए। 2025-26 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में 195 मौतें और 10,525 मकानों के क्षतिग्रस्त होने की सूचना है। इन आंकड़ों में अलग-अलग प्रकार की घटनाएं शामिल हैं और इन्हें केवल भूस्खलन या बाढ़ की मौतें मानना उचित नहीं होगा। फिर भी ये बताते हैं कि पहाड़ी राज्यों में आपदा का आर्थिक और मानवीय बोझ कितना बड़ा हो गया है। उत्तराखंड में 2025 में भी बादल फटने, अचानक बाढ़ और भूस्खलन की कई घटनाएं हुईं। धराली जैसी घटनाओं ने दिखाया कि कुछ ही मिनटों में नदी और मलबा पूरे बस्ती क्षेत्र का स्वरूप बदल सकते हैं।
और अब नेपाल की त्रासदी
अगस्त 2026 की नेपाल-तिब्बत सीमा क्षेत्र की त्रासदी ने पूरे हिमालय को फिर झकझोर दिया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार नेपाल के रसुवा क्षेत्र में हिमालयी क्षेत्र से जुड़े अचानक आए बाढ़ के प्रकोप में 1243 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता थे। नेपाल के प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार 85 सुरक्षाकर्मी भी लापता थे। विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े 60 लोग, 391 विदेशी पर्यटक और 93 नेपाली पर्यटक भी संपर्क से बाहर बताए गए। बाढ़ में 19 मोटर योग्य पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क क्षतिग्रस्त हुई। ये आंकड़े 26 अगस्त 2026 तक की स्थिति के हैं और बचाव अभियान जारी रहने के कारण बदल सकते हैं। अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में नेपाल और तिब्बत को मिलाकर मृतकों और लापता लोगों की संख्या इससे कहीं अधिक बताई गई है। इसलिए अंतिम आंकड़ा राहत एवं खोज अभियान पूरा होने के बाद ही स्पष्ट होगा। नेपाल की यह त्रासदी भारत के लिए भी सीधी चेतावनी है। हिमालय किसी राजनीतिक सीमा से बंटा हुआ पर्वत नहीं है। उसकी बर्फ, नदियां, ग्लेशियर और भूगर्भीय प्रक्रियाएं भारत, नेपाल, भूटान और तिब्बत के बीच साझा प्राकृतिक व्यवस्था हैं।
केवल प्रकृति दोषी नहीं
प्राकृतिक आपदा को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन प्राकृतिक खतरे को मानवीय त्रासदी बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। हिमालय में अनियंत्रित सड़क चैड़ीकरण, पहाड़ों की कटाई, नदी के प्राकृतिक मार्ग में निर्माण, अत्यधिक पर्यटन, जलविद्युत परियोजनाओं का दबाव, कमजोर जल-निकासी व्यवस्था और भूगर्भीय संवेदनशीलता की अनदेखी जोखिम को बढ़ाती है। सरकार की ओर से भी कई महत्वपूर्ण प्रयास हुए हैं। उपग्रह निगरानी, भूस्खलन मानचित्रण, हिमनदीय झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणालियां, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजनाएं और बचाव बलों की क्षमता में वृद्धि हुई है। हिमाचल सहित पर्वतीय राज्यों के लिए केंद्र ने आपदा जोखिम कम करने, समुदाय आधारित तैयारी और प्रारंभिक चेतावनी को मजबूत करने के कार्यक्रम चलाए हैं। भू-स्थान आधारित चेतावनी व्यवस्था के माध्यम से मौसम विभाग, केंद्रीय जल आयोग, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य संस्थाओं की चेतावनियों को जोड़ने की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सब पर्याप्त है?
हिमालय के लिए नई विकास नीति जरूरी
अब समय राहत और पुनर्वास से आगे बढ़कर आपदा रोकथाम आधारित विकास का है। हर पहाड़ी जिले की वहन क्षमता वैज्ञानिक तरीके से निर्धारित की जानी चाहिए। जहां भूस्खलन का खतरा अधिक है, वहां निर्माण पर स्पष्ट प्रतिबंध होना चाहिए। नदियों के प्राकृतिक बहाव क्षेत्र में निर्माण रोकना होगा। बड़ी सड़क, सुरंग और जलविद्युत परियोजनाओं का मूल्यांकन केवल एक परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि पूरी घाटी पर उनके संयुक्त प्रभाव के आधार पर होना चाहिए। हर संवेदनशील हिमनदीय झील की चैबीसों घंटे निगरानी हो। उपग्रह, ड्रोन, स्वचालित सेंसर, मौसम केंद्र और स्थानीय लोगों की सूचनाओं को एक साथ जोड़कर वास्तविक समय की चेतावनी व्यवस्था बनाई जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात, चेतावनी केवल सरकारी कार्यालय तक नहीं पहुंचनी चाहिए। वह गांव के अंतिम घर तक पहुंचे। सायरन हो, मोबाइल संदेश हो, सुरक्षित मार्ग पहले से तय हों और स्थानीय युवाओं को बचाव का प्रशिक्षण मिले। सरकार को हिमालयी आपदाओं का एक सार्वजनिक राष्ट्रीय आंकड़ा केंद्र भी बनाना चाहिए, जिसमें प्रत्येक घटना के मृतक, घायल, लापता, विस्थापित, आर्थिक नुकसान, सड़क बंद होने की अवधि और पुनर्निर्माण की स्थिति दर्ज हो। आज केंद्र स्वयं स्वीकार करता है कि देशभर की आपदाओं में जान-माल के नुकसान का कोई केंद्रीय समेकित आंकड़ा उसके पास नहीं है और आंकड़े राज्यों से प्राप्त रिपोर्टों पर आधारित हैं।
केदारनाथ से चमोली, सिक्किम से हिमाचल और अब नेपाल तक हिमालय लगातार हमें एक ही संदेश दे रहा है, पहाड़ को केवल संसाधन समझकर उसके साथ व्यवहार नहीं किया जा सकता। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं। सैकड़ों हिमनदीय झीलों का विस्तार हो रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं गंभीर नुकसान पहुंचा रही हैं। भूस्खलन लगातार जीवन और बुनियादी ढांचे को प्रभावित कर रहे हैं। हिमालय को विकास से अलग करना समाधान नहीं है। समाधान है-हिमालय की प्रकृति के अनुरूप विकास। सड़कें बनें, लेकिन पहाड़ काटकर नहींय बिजली बने, लेकिन घाटियों की वहन क्षमता को नष्ट करके नहींय पर्यटन बढ़े, लेकिन प्रकृति की सीमा तोड़कर नहीं। क्योंकि सवाल यह नहीं है कि अगली आपदा आएगी या नहीं। सवाल यह है कि जब अगली आपदा आएगी, तब हम कितनी जानें बचाने के लिए तैयार होंगे। और उससे भी बड़ा सवाल है-’’क्या हम हिमालय को बचाने के लिए अपनी विकास की परिभाषा बदलने को तैयार हैं?’’
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
