कविता मनुष्य की संवेदना, कल्पना और विचार की सबसे सघन अभिव्यक्तियों में से एक है। वह केवल तुकबंदी या भावुक शब्दों का समूह नहीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य के भीतर चल रहे द्वंद्व को शब्द देने की कला है। इसलिए कविता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसे कितनी तालियाँ मिलीं, कितने लोगों ने उसे सुना या सोशल मीडिया पर कितने लोगों ने उसे लाइक और शेयर किया। आज कविता एक दिलचस्प संक्रमण के दौर से गुजर रही है। एक ओर कवि सम्मेलन और साहित्यिक मंच हैं, जहाँ कविता सामूहिक रूप से सुनी जाती है, दूसरी ओर फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल मंच हैं, जहाँ कविता कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच जाती है। माध्यम बदला है, पाठक बदला है और प्रस्तुति का ढंग भी बदला है। ऐसे में स्वाभाविक प्रश्न है-क्या कविता का स्तर भी बदल गया है?
मंच की कविता और उसका साहित्यिक अनुशासन
कभी कवि सम्मेलन केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं होते थे। वे साहित्यिक संस्कार के सार्वजनिक मंच थे। कवि अपनी रचना को बार-बार सँवारकर श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करता था। भाषा, छंद, लय, बिंब, प्रतीक और कथ्य पर पर्याप्त मेहनत की जाती थी। श्रोता भी कविता को सुनने और समझने की तैयारी के साथ आते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने साहित्य के संबंध को व्यापक सामाजिक जीवन और लोकमंगल से जोड़कर देखने पर जोर दिया। उनके आलोचनात्मक चिंतन में साहित्य का मूल्य केवल मनोरंजन में नहीं, बल्कि मनुष्य और समाज के व्यापक हित से भी जुड़ता है। यही दृष्टि आज भी कविता के मूल्यांकन के लिए उपयोगी है। कविता कितनी लोकप्रिय है, यह महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन उससे पहले यह देखना जरूरी है कि कविता मनुष्य के अनुभव को कितनी गहराई से व्यक्त करती है। मंचीय कविता में हास्य, व्यंग्य, वीर रस, श्रृंगार और सामाजिक सरोकार सभी के लिए स्थान रहा है। समस्या हास्य या मनोरंजन में नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कविता का उद्देश्य केवल तत्काल तालियाँ प्राप्त करना रह जाए। तालियाँ कविता का पुरस्कार हो सकती हैं, लेकिन कविता की गुणवत्ता का प्रमाणपत्र नहीं।
तालियों से लोकप्रियता तक
मंच पर कवि की लोकप्रियता का एक बड़ा आधार उसकी प्रस्तुति होती है। प्रभावशाली आवाज, चेहरे के भाव, मंच संचालन और श्रोताओं से संवाद कविता के प्रभाव को बढ़ाते हैं। कई बार साधारण पंक्ति भी शानदार प्रस्तुति के कारण खूब तालियाँ बटोर लेती है और गंभीर कविता अपेक्षाकृत शांत प्रतिक्रिया के साथ समाप्त हो जाती है। यहाँ हमें लोकप्रियता और श्रेष्ठता के बीच का अंतर समझना होगा। हर लोकप्रिय कविता श्रेष्ठ नहीं होती और हर श्रेष्ठ कविता तत्काल लोकप्रिय हो, यह भी आवश्यक नहीं। साहित्य का प्रभाव कई बार धीरे-धीरे विकसित होता है। कुछ कविताएँ सुनते ही तालियाँ पाती हैं, जबकि कुछ कविताएँ सुनने के बाद पाठक के भीतर लंबे समय तक काम करती रहती हैं। नामवर सिंह की आलोचना-दृष्टि इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। उन्होंने कविता के नए प्रतिमान के माध्यम से समकालीन कविता को परखने के लिए नए मानदंडों की आवश्यकता पर बल दिया था। उनके अनुसार आलोचना का काम केवल रचना की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके रचनात्मक और वैचारिक पक्षों की पड़ताल करना भी है। इसलिए कविता को केवल मंचीय प्रभाव से नहीं, उसके कथ्य और शिल्प से भी परखा जाना चाहिए।
सोशल मीडिया ने बदली कविता की दुनिया
सोशल मीडिया ने कविता के सामने अभूतपूर्व संभावनाएँ खोल दी हैं। अब किसी कवि को अपनी कविता प्रकाशित कराने के लिए किसी पत्रिका के संपादकीय कार्यालय के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं। वह अपनी कविता स्वयं प्रकाशित कर सकता है और कुछ ही समय में देश-दुनिया के पाठकों तक पहुँच सकता है। डिजिटल माध्यम ने कविता को अधिक लोकतांत्रिक बनाया है। छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों से लिखने वाले अनेक रचनाकारों को पाठक मिले हैं। कविता की वीडियो प्रस्तुति ने उन लोगों को भी कविता से जोड़ा है, जो शायद पारंपरिक साहित्यिक गोष्ठियों तक कभी नहीं पहुँच पाते। हाल के एक आलोचनात्मक लेख में डॉ. सुशील कुमार शर्मा ने भी रेखांकित किया है कि डिजिटल युग ने साहित्य को बहुत तेजी से आम पाठक तक पहुँचाया है, लेकिन अनुशासन और आत्मचिंतन के अभाव में यही लोकतांत्रिक मंच साहित्य के लिए चुनौती भी बन सकता है। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों है। यहाँ प्रवेश सबके लिए खुला है, लेकिन साहित्यिक कसौटी का द्वार स्वयं लेखक को बनाना पड़ता है।
लाइक-शेयर बनाम साहित्यिक गुणवत्ता
सोशल मीडिया ने कविता के मूल्यांकन की एक नई समस्या पैदा की है। कविता के नीचे हजारों लाइक दिखाई देते हैं तो हम उसे स्वतः अच्छी कविता मान लेते हैं। कोई कविता लाखों बार देखी जाती है तो उसे सफल समझ लिया जाता है। लेकिन क्या व्यूज साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना हैं? निश्चित रूप से नहीं। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम उस सामग्री को अधिक लोगों तक पहुँचाता है, जो तुरंत ध्यान आकर्षित करती है। छोटी, भावुक, चैंकाने वाली या आसानी से साझा की जा सकने वाली पंक्तियाँ तेजी से फैलती हैं। गंभीर और विचारप्रधान कविता को कई बार उतनी तत्काल लोकप्रियता नहीं मिलती। यहीं से एक दूसरी समस्या पैदा होती है। कविता और कथन के बीच का अंतर मिटने लगता है। किसी सामान्य जीवन-सूक्ति को चार पंक्तियों में तोड़ देना कविता नहीं बन जाता। प्रेम, अकेलापन, सफलता, असफलता या रिश्तों पर भावुक वाक्य लिख देना अभिव्यक्ति हो सकती है, लेकिन साहित्यिक कविता बनने के लिए उसमें भाषा का सौंदर्य, अनुभव की प्रामाणिकता, कल्पना और कलात्मक संरचना भी आवश्यक है। कविता लिखना आसान हो सकता है, अच्छी कविता लिखना कठिन है।
कविता का भविष्य, माध्यम नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण
आधुनिक हिंदी कविता के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह का उदाहरण यहाँ विशेष रूप से प्रासंगिक है। उनके काव्य में सामान्य जीवन, गाँव-कस्बे की संवेदना, सामाजिक यथार्थ और प्रकृति के प्रति गहरी चिंता दिखाई देती है। एक शोध-अध्ययन उन्हें आधुनिक हिंदी कविता के प्रमुख कवियों में रखते हुए उनकी कविता में ग्रामीण-कस्बाई संवेदना, यथार्थबोध और पर्यावरणीय चेतना को विशेष रूप से रेखांकित करता है। केदारनाथ सिंह का महत्व इस बात में भी है कि उन्होंने साधारण जीवन के अनुभवों को साधारण भाषा में लिखते हुए भी कविता को साधारण नहीं होने दिया। यही अंतर सोशल मीडिया की अनेक लोकप्रिय कविताओं और टिकाऊ साहित्य के बीच दिखाई देता है। नंदकिशोर नवल ने केदारनाथ सिंह की कविता में सुंदर और मूल्यवान चीजों के प्रति आकर्षण तथा दुनिया को बेहतर बनाने वाली शक्ति के प्रति आशावाद को महत्वपूर्ण माना है। आज के कवि के सामने चुनौती यही है कि वह सोशल मीडिया की तात्कालिक लोकप्रियता के दबाव में अपनी कविता की गंभीरता न खो दे। सोशल मीडिया को कविता का दुश्मन मानना भी गलत होगा और उसे कविता का अंतिम मानदंड मान लेना भी। मंच और सोशल मीडिया दोनों की अपनी उपयोगिता है। मंच कविता को सामूहिक श्रवण और जीवंत संवाद देता है। सोशल मीडिया उसे व्यापक पहुँच और नए पाठक देता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि माध्यम कविता पर हावी न हो जाए। कविता का स्तर लाइक, शेयर और व्यूज से नहीं तय होना चाहिए। उसे भाषा, संवेदना, विचार, शिल्प और समय की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। आलोचना की भूमिका भी इसी कारण आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल से लेकर नामवर सिंह तक हिंदी आलोचना की परंपरा हमें यही सिखाती है कि साहित्य को उसके व्यापक संदर्भ, रचनात्मकता और सामाजिक अर्थों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। नामवर सिंह स्वयं आलोचना को रचना के साथ गंभीर संवाद की प्रक्रिया मानते थे। अंततः कविता का माध्यम बदल सकता है, उसका पाठक बदल सकता है और उसकी प्रस्तुति का तरीका भी बदल सकता है, लेकिन अच्छी कविता की पहचान नहीं बदलती। वह मनुष्य के भीतर कुछ जगाती है, उसे सोचने पर विवश करती है और पढ़े या सुने जाने के बाद भी भीतर बनी रहती है। मंच की तालियाँ क्षणिक हैं, सोशल मीडिया के व्यूज भी। लेकिन सच्ची कविता समय से संवाद करती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कविता मंच पर बेहतर है या सोशल मीडिया पर। असली प्रश्न यह है कि हम कविता को लोकप्रिय बनाने के साथ-साथ श्रेष्ठ बनाने की चिंता भी कर रहे हैं या नहीं। यदि कविता के साथ साहित्यिक अनुशासन, आत्मालोचन और भाषा के प्रति ईमानदारी बनी रहती है तो सोशल मीडिया कविता के पतन का माध्यम नहीं, उसके विस्तार का सबसे शक्तिशाली माध्यम सिद्ध हो सकता है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
