दुनिया के सबसे बंद और दमनकारी देशों में गिने जाने वाले उत्तर कोरिया की तस्वीर आमतौर पर मिसाइलों, परमाणु हथियारों और तानाशाह किम जोंग उन की सैन्य परेडों के साथ सामने आती है। लेकिन इस चमकदार सैन्य शक्ति के पीछे एक और भयावह व्यवस्था चलती है, अपने नागरिकों को विदेशों में काम करने भेजना और उनके श्रम से विदेशी मुद्रा अर्जित करना। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यह व्यवस्था एक नए और अधिक चिंताजनक रूप में दिखाई दे रही है। रूस में श्रमिकों की कमी और उत्तर कोरिया-रूस के बढ़ते सैन्य गठजोड़ के बीच उत्तर कोरियाई नागरिकों के रूस पहुंचने की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। निर्माण स्थलों से लेकर माल-वितरण केंद्रों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों तक उत्तर कोरियाई कामगारों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इनमें महिलाओं की मौजूदगी ने विशेष चिंता पैदा की है। वर्ष 2025 में रूस की ऑनलाइन खरीद-बिक्री कंपनी ‘वाइल्डबेरीज’ के एक माल-वितरण केंद्र में सैकड़ों उत्तर कोरियाई महिलाओं के कथित रूप से काम करने की खबर सामने आई थी। हालांकि कंपनी ने विदेशी श्रमिकों के एक परीक्षण कार्यक्रम की बात स्वीकार की थी, लेकिन इन महिलाओं की उत्तर कोरियाई पहचान और उनकी वास्तविक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।
पासपोर्ट से लेकर मजदूरी तक पर नियंत्रण
वर्ष 2026 में ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की एक महत्वपूर्ण जांच ने इस पूरे तंत्र की भयावहता पर नया प्रकाश डाला है। संगठन ने रूस के तीन शहरों में निर्माण स्थलों पर काम कर चुके 21 उत्तर कोरियाई श्रमिकों के साक्षात्कार किए। उनके अनुसार रूस पहुंचने के बाद उनके पासपोर्ट जब्त कर लिए गए और उन्हें प्रतिदिन 12 से 16 घंटे तक काम करना पड़ा। कुछ श्रमिकों ने वर्ष में 364 दिन तक काम करने की बात कही। यहां सवाल सिर्फ लंबे काम के घंटों का नहीं है। असली सवाल है, क्या इन श्रमिकों को अपने श्रम और अपनी कमाई पर अधिकार है? ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ की रिपोर्ट के अनुसार कुछ श्रमिक लगभग 800 डॉलर अर्थात करीब 67 हजार रुपये प्रतिमाह की मजदूरी अर्जित करते थे, लेकिन उत्तर कोरियाई सरकार अनिवार्य कोटे और दूसरी कटौतियों के जरिए लगभग 600 डॉलर तक ले लेती थी। कुछ मामलों में श्रमिक के हाथ में महीने के अंत में केवल लगभग 10 डॉलर यानी करीब 850 रुपये ही बचते थे। उत्तर कोरिया विशेषज्ञ येझी किम ने एक बातचीत में बताया कि कुछ श्रमिकों को प्रतिदिन 16 घंटे तक काम करना पड़ता है, उन्हें छुट्टी नहीं मिलती और उनके हाथ में महीने के अंत में बहुत मामूली रकम बचती है। उनका आकलन इस बात की ओर संकेत करता है कि विदेश भेजे गए श्रमिकों की कमाई पर प्योंगयांग का नियंत्रण बेहद कठोर है।
‘गुलामी’ शब्द क्यों इस्तेमाल हो रहा है?
यहां ‘गुलाम’ शब्द केवल भावनात्मक विशेषण नहीं है। मानवाधिकार संगठनों ने जिन परिस्थितियों का वर्णन किया है, उनमें जबरन श्रम के कई संकेत दिखाई देते हैं। जैसे, आवागमन पर प्रतिबंध, दस्तावेजों पर नियंत्रण, लगातार निगरानी, अत्यधिक लंबे काम के घंटे और मजदूरी का बड़ा हिस्सा राज्य द्वारा अपने नियंत्रण में लेना। मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ की वरिष्ठ शोधकर्ता लीना यून ने उत्तर कोरिया के विदेश भेजे जाने वाले श्रमिकों को लेकर गंभीर चिंता जताई है। उनके अनुसार उत्तर कोरियाई सरकार देश के भीतर और विदेशों में श्रम तथा निगरानी के जरिए अपने नागरिकों का शोषण करती है। लीना यून का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उत्तर कोरिया के साथ संबंधों में केवल मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम को ही नहीं, बल्कि मानवाधिकारों और विदेशों में तैनात उत्तर कोरियाई नागरिकों की स्थिति को भी प्राथमिकता देनी चाहिए।
किम जोंग उन के लिए मजदूर भी विदेशी मुद्रा का स्रोत
उत्तर कोरिया पर लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। इसलिए विदेशी मुद्रा हासिल करना उसके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विदेशों में श्रमिक भेजना प्योंगयांग के लिए इसी आर्थिक रणनीति का हिस्सा रहा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने पहले भी रूस की कंपनियों और उत्तर कोरियाई संस्थाओं पर कार्रवाई करते हुए कहा था कि वे उत्तर कोरियाई जबरन श्रम के विदेशों में निर्यात में शामिल थे और इससे प्राप्त आय उत्तर कोरियाई सरकार अथवा सत्तारूढ़ वर्कर्स पार्टी तक पहुंचती थी। वर्ष 2026 में ‘सिटिजन्स अलायंस फॉर नॉर्थ कोरियन ह्यूमन राइट्स’ की एक जांच ने रूस में उत्तर कोरिया से जुड़े एक बड़े नेटवर्क का दावा किया। संगठन के अनुसार रूस में उत्तर कोरिया से जुड़ी अनेक सैन्य एवं सुरक्षा कंपनियों तथा बड़ी संख्या में रूसी कंपनियों, शैक्षणिक संस्थानों और वित्तीय संस्थाओं के बीच ऐसा नेटवर्क मौजूद है, जो श्रमिकों की तैनाती से मिलने वाले राजस्व को उत्तर कोरिया के सैन्य और परमाणु कार्यक्रमों से जोड़ता है। इसका अर्थ यह है कि किसी रूसी निर्माण स्थल पर ईंट लगाने वाला मजदूर केवल एक मजदूर नहीं रह जाता। उसके श्रम से उत्पन्न धन का एक हिस्सा उस शासन की आर्थिक क्षमता बढ़ा सकता है, जो परमाणु हथियार और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम चला रहा है।
यूक्रेन युद्ध ने बदली पूरी तस्वीर
रूस के लिए भी यह व्यवस्था सुविधाजनक है। यूक्रेन युद्ध ने रूस की अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी पैदा की है। निर्माण, माल-वितरण, कारखानों और दूसरे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में अतिरिक्त हाथों की जरूरत बढ़ी है। रूस और उत्तर कोरिया के बीच वर्ष 2024 में हुई व्यापक रणनीतिक साझेदारी ने दोनों देशों को एक-दूसरे की जरूरतों के और करीब ला दिया। उत्तर कोरिया रूस को हथियार और सैनिक उपलब्ध करा रहा है, जबकि रूस के साथ आर्थिक और राजनीतिक सहयोग प्योंगयांग को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दबाव से राहत देता दिखाई देता है। रॉयटर्स की 6 अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार रूस के युद्ध प्रयासों में उत्तर कोरिया की भूमिका काफी बढ़ गई है। हजारों उत्तर कोरियाई सैनिकों के अलावा निर्माण और अन्य कार्यों के लिए भी उत्तर कोरियाई कर्मियों की मौजूदगी दर्ज की गई है। इसलिए रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों का प्रश्न अब केवल ‘मजदूरों की कमी’ का प्रश्न नहीं है। यह रूस-उत्तर कोरिया की व्यापक रणनीतिक साझेदारी का हिस्सा बन चुका है।
संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध और रूस की भूमिका
सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में रोजगार दिलाने की व्यवस्था पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रतिबंध लगाए हैं। सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 2397 के तहत उत्तर कोरियाई नागरिकों को विदेशों में आय अर्जित करने के लिए भेजने की व्यवस्था पर रोक लगाई गई थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विदेशों में काम करने वाले उत्तर कोरियाई नागरिकों से प्राप्त विदेशी मुद्रा प्योंगयांग के हथियार कार्यक्रमों तक न पहुंचे। लेकिन आज स्थिति यह है कि उसी रूस के साथ उत्तर कोरिया का संबंध इतना गहरा हो गया है कि इन प्रतिबंधों को लागू कराना बेहद कठिन हो गया है। यही कारण है कि इस पूरे मामले को केवल ‘मजदूरों के शोषण’ के रूप में देखना अधूरा होगा। यह अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध व्यवस्था की कमजोरी और बदलती वैश्विक राजनीति का भी उदाहरण है।
महिलाएं सबसे आसान निशाना?
उत्तर कोरियाई महिलाओं की स्थिति इस कहानी को और गंभीर बनाती है। ‘वाइल्डबेरीज’ के मामले में सामने आई तस्वीरों और रिपोर्टों में एक जैसी पोशाक पहने महिलाओं को समूहों में काम करते दिखाया गया था। उनके साथ पुरुष पर्यवेक्षकों की मौजूदगी और नियंत्रित आवागमन की खबरों ने सवाल खड़े किए। हालांकि इन दावों का हर हिस्सा स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं हुआ है, इसलिए इन्हें अंतिम तथ्य के बजाय आरोप और रिपोर्ट के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन व्यापक उत्तर कोरियाई श्रम व्यवस्था को लेकर उपलब्ध प्रमाण कहीं अधिक मजबूत हैं। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ के अनुसार उत्तर कोरिया के भीतर भी महिलाओं समेत विभिन्न वर्गों से जबरन श्रम कराया जाता है। विदेशों में भेजे गए श्रमिकों के मामले में पासपोर्ट, आवाजाही और संपर्क पर नियंत्रण इस व्यवस्था को और कठोर बनाता है।
परिवार बन जाता है ‘गारंटी’
इस व्यवस्था का सबसे भयावह पक्ष शायद वह है जो कारखाने की दीवारों के बाहर दिखाई ही नहीं देता। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ के अनुसार रूस में काम करने वाले उत्तर कोरियाई श्रमिकों पर केवल व्यक्तिगत निगरानी ही नहीं रहती। भागने या विरोध करने की स्थिति में उत्तर कोरिया में उनके परिवारों को भी रोजगार, आवास, आर्थिक दंड, पूछताछ और अन्य दमन का सामना करना पड़ सकता है। अर्थात एक श्रमिक रूस में बंद है तो उसके परिवार की जिंदगी उत्तर कोरिया में बंधक बनी रहती है। यही वह तंत्र है जो श्रमिक को भागने से रोकता है, भले ही वह स्वयं रूस की किसी फैक्ट्री या निर्माण स्थल से बाहर निकलना चाहता हो।
दो सरकारों का हित, मजदूर का नुकसान
यह पूरा मॉडल तीन स्तरों पर काम करता दिखाई देता है। पहला, रूस को सस्ते और अनुशासित श्रमिक मिलते हैं। दूसरा, उत्तर कोरियाई शासन को विदेशी मुद्रा मिलती है। तीसरा, दोनों देशों के बीच बढ़ता रणनीतिक गठजोड़ प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय आलोचना के बावजूद मजबूत होता है।
नुकसान किसका है?
उस मजदूर का, जो 12-16 घंटे काम करता है। उस महिला का, जिसकी आवाजाही नियंत्रित है। उस परिवार का, जो उत्तर कोरिया में रहकर किसी संभावित विद्रोह की कीमत चुका सकता है। और अंततः उस वैश्विक व्यवस्था का, जिसने जबरन श्रम को रोकने के लिए नियम बनाए थे।
क्या यह आधुनिक गुलामी है?
कानूनी और मानवाधिकार विशेषज्ञों के लिए आधुनिक गुलामी की पहचान केवल यह नहीं है कि मजदूरी कम है। सवाल है-क्या व्यक्ति अपनी नौकरी छोड़ सकता है? क्या वह अपने दस्तावेज अपने पास रख सकता है? क्या वह स्वतंत्र रूप से घूम सकता है? क्या उसे अपनी कमाई पर अधिकार है? क्या वह विरोध करने पर सुरक्षित रहता है? रूस में उत्तर कोरियाई श्रमिकों के संबंध में उपलब्ध वर्ष 2026 की जांचों में इन सवालों के जवाब बेहद चिंताजनक हैं। ‘ग्लोबल राइट्स कम्प्लायंस’ ने अपने शोध में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के जबरन श्रम के संकेतकों का इस्तेमाल किया और निगरानी, दबाव तथा राज्य नियंत्रण की व्यापक व्यवस्था का उल्लेख किया है। इसलिए ‘आधुनिक गुलामी’ शब्द को केवल सनसनी पैदा करने वाला शब्द मानकर खारिज करना भी उचित नहीं होगा। रूस को मजदूर चाहिए और उत्तर कोरिया को विदेशी मुद्रा। यूक्रेन युद्ध ने दोनों की जरूरतों को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इस सौदे में मजदूर की स्वतंत्रता कहां है? एक लोकतांत्रिक दुनिया के लिए यह बेहद असहज सवाल है कि 21वीं सदी में कोई सरकार अपने नागरिकों को हजारों किलोमीटर दूर भेजे, उनके दस्तावेज अपने पास रखे, उनकी कमाई का बड़ा हिस्सा ले और उनके परिवारों को नियंत्रण के साधन के रूप में इस्तेमाल करे और फिर भी यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय राजनीति की परतों में छिपी रहे। किम जोंग उन के लिए यह विदेशी मुद्रा का कारोबार हो सकता है। रूस के लिए यह श्रमिकों की कमी दूर करने का रास्ता हो सकता है। लेकिन उन महिलाओं और पुरुषों के लिए, जो इन कारखानों और निर्माण स्थलों में काम कर रहे हैं, यह उनकी जिंदगी, मेहनत और स्वतंत्रता की कीमत पर होने वाला सौदा है। और शायद इस कहानी का सबसे भयावह पहलू यही है इन मजदूरों का श्रम दिखाई देता है, लेकिन उनका अधिकार नहीं।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
