भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है। यही युवा देश के विकास की सबसे बड़ी शक्ति माने जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह युवाओं से जुड़े जघन्य अपराध सामने आए हैं, उन्होंने पूरे समाज को चिंता में डाल दिया है। मामूली विवाद में हत्या, प्रेम संबंधों में बर्बरता, सड़क पर हिंसा, गैंग संस्कृति और सोशल मीडिया के लिए अपराध जैसी घटनाएँ यह सोचने पर विवश करती हैं कि आखिर युवाओं के एक वर्ग में संवेदनहीनता और क्रूरता क्यों बढ़ रही है? यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि समाज, परिवार, शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है।
जब घटनाओं ने पूरे देश को झकझोर दिया
पिछले दस वर्षों में कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिन्होंने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। वर्ष 2017 का गुरुग्राम का प्रद्युम्न हत्याकांड, 2019 में हैदराबाद की महिला पशु चिकित्सक के साथ सामूहिक दुष्कर्म और हत्या, 2022 का श्रद्धा वालकर हत्याकांड, 2023 में दिल्ली की साक्षी की सरेआम हत्या, 2024 का पुणे पोर्शे कार हादसा, 2025 का चर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड तथा हाल के समय में सिया गोयल-केतन अग्रवाल प्रकरण और बेंगलुरु में सामने आईं कई क्रूर घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि कुछ मामलों में हिंसा पहले से अधिक निर्मम और संवेदनहीन होती जा रही है। घटनाएँ अलग-अलग हैं, लेकिन हर घटना समाज से यही सवाल पूछती है क्या हम अपनी युवा पीढ़ी को सही दिशा दे पा रहे हैं?
आँकड़े भी बढ़ा रहे हैं चिंता
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़े बताते हैं कि किशोरों और युवाओं से जुड़े गंभीर अपराध चिंता का विषय बने हुए हैं। हत्या, गंभीर हमला, महिलाओं के विरुद्ध अपराध और किशोर अपराधों के मामलों में लगातार सतर्क रहने की आवश्यकता बनी हुई है। यह भी सच है कि देश के अधिकांश युवा कानून का सम्मान करने वाले और समाज के निर्माण में लगे हुए हैं, लेकिन कुछ जघन्य घटनाएँ पूरी पीढ़ी की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं।
मनोचिकित्सक क्या कहते हैं
प्रख्यात मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारिख का मानना है कि आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा, अकेलेपन और असफलता के भय से जूझ रहा है। यदि उसे समय पर भावनात्मक सहयोग और मनोवैज्ञानिक परामर्श नहीं मिलता, तो कुछ मामलों में यह आक्रामक व्यवहार का रूप ले सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी के अनुसार बच्चों और युवाओं को केवल अच्छी शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा, संवाद और अपनापन भी चाहिए। जब परिवार में संवाद कम होता है, तब कई समस्याएँ भीतर ही भीतर पनपने लगती हैं। वहीं डॉ. संजय चुघ का कहना है कि क्रोध पर नियंत्रण न होना, आवेग में निर्णय लेना और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति हिंसक अपराधों की पृष्ठभूमि तैयार करती है। इसलिए मानसिक स्वास्थ्य को शिक्षा और स्वास्थ्य नीति का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
परिवार की बदलती तस्वीर
संयुक्त परिवारों का टूटना, माता-पिता की व्यस्त दिनचर्या, बच्चों के साथ संवाद में कमी और मोबाइल पर बढ़ती निर्भरता ने पारिवारिक संबंधों को प्रभावित किया है। अनेक बच्चे अपनी परेशानियाँ किसी से साझा नहीं कर पाते। धीरे-धीरे यह अकेलापन कुंठा, अवसाद और आक्रोश में बदल सकता है। परिवार यदि समय रहते बच्चे के व्यवहार में आ रहे बदलावों को समझ ले, तो कई समस्याओं को शुरुआत में ही रोका जा सकता है।
क्या सोशल मीडिया भी जिम्मेदार है
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया स्वयं अपराध नहीं कराता, लेकिन हिंसक वीडियो, वेब सीरीज, ऑनलाइन गेम और लगातार डिजिटल दुनिया में डूबे रहने का असर कुछ युवाओं के व्यवहार पर पड़ सकता है। वायरल होने की मानसिकता, त्वरित प्रसिद्धि की चाह और आक्रामक सामग्री के लगातार संपर्क से कुछ युवाओं की संवेदनशीलता कम हो जाती है। इसलिए डिजिटल साक्षरता भी समय की मांग बन चुकी है।
नशा और गैंग संस्कृति का बढ़ता असर
शराब, ड्रग्स और अन्य नशीले पदार्थ निर्णय क्षमता को प्रभावित करते हैं। कई अपराधों में नशा एक महत्वपूर्ण कारक पाया गया है। इसके साथ ही कुछ क्षेत्रों में गैंग संस्कृति, हथियारों का आकर्षण और सोशल मीडिया पर अपराधियों का महिमामंडन भी युवाओं को गलत दिशा में प्रेरित कर रहा है।
सफलता का बढ़ता दबाव
समाजशास्त्रियों का कहना है कि आज का समाज सफलता को केवल धन, प्रसिद्धि और दिखावे से जोड़कर देखता है। असफलता को स्वीकार करने का धैर्य कम होता जा रहा है। प्रतियोगिता इतनी तीव्र हो गई है कि अनेक युवा मानसिक दबाव में जी रहे हैं। जब भावनात्मक संतुलन कमजोर होता है, तो छोटी-सी बात भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान लगातार इस बात पर बल देता रहा है कि किशोरावस्था और युवावस्था में मानसिक स्वास्थ्य की समय पर पहचान और परामर्श अत्यंत आवश्यक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी युवाओं में हिंसा को केवल अपराध नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की चुनौती मानता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूलों और कॉलेजों में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक उपलब्ध होना अब विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
क्या है समाधान
समस्या जटिल है, इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए।
1.प्रत्येक विद्यालय और महाविद्यालय में मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता नियुक्त किए जाएँ।
2.जीवन-कौशल, नैतिक शिक्षा, सहानुभूति और क्रोध-प्रबंधन को शिक्षा का हिस्सा बनाया जाए।
3.माता-पिता प्रतिदिन बच्चों से खुलकर बातचीत करें और उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान दें।
4.खेल, साहित्य, संगीत और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए ताकि युवाओं की ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगे।
5.नशा-विरोधी अभियानों को और प्रभावी बनाया जाए।
6.सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग की शिक्षा दी जाए।
7.गंभीर अपराधों में त्वरित न्याय और प्रभावी कानून-व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी जिम्मेदार
हिंसा केवल पुलिस या अदालतों से नहीं रुकेगी। इसके लिए परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया और सरकार सभी को अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। बच्चों को बचपन से ही संवेदनशीलता, सहिष्णुता, संवाद और मानवीय मूल्यों का संस्कार देना होगा। यदि हम केवल आर्थिक सफलता को ही उपलब्धि मानते रहेंगे और चरित्र निर्माण की उपेक्षा करेंगे, तो ऐसी घटनाएँ बार-बार सामने आती रहेंगी। यह सही नहीं होगा कि कुछ अपराधों के आधार पर पूरी युवा पीढ़ी को कठघरे में खड़ा कर दिया जाए। आज भी देश के करोड़ों युवा विज्ञान, शिक्षा, सेना, चिकित्सा, खेल, साहित्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में अद्भुत कार्य कर रहे हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि बढ़ती हिंसा हमें समय रहते सचेत होने का संदेश दे रही है। यदि परिवार संवाद का वातावरण बनाए, शिक्षा व्यवस्था संवेदनशील नागरिक तैयार करे, मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता मिले और समाज सकारात्मक मूल्यों को पुनः स्थापित करे, तो निश्चित ही इस चुनौती का समाधान संभव है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है, और उन हाथों में किताब, कौशल और करुणा होनी चाहिए, हथियार और हिंसा नहीं।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
