रोजगार, शिक्षा और व्यवस्था से जुड़े सवालों ने युवाओं को एक बार फिर सड़कों पर ला खड़ा किया है। जंतर-मंतर पर उमड़ी भीड़, सोशल मीडिया पर बढ़ती सक्रियता और पारंपरिक राजनीति से मोहभंग के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारत किसी नए सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन की दहलीज पर खड़ा है? भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति, अन्ना हजारे का जनलोकपाल आंदोलन और किसान आंदोलन तक, समय-समय पर जनभावनाओं ने सत्ता और व्यवस्था को नई दिशा दी है। इन आंदोलनों में एक बात समान रही है, जब युवाओं ने किसी मुद्दे को अपना मुद्दा बना लिया, तब परिवर्तन की संभावना भी बढ़ी। इन दिनों कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं का आंदोलन चर्चा में है। बेरोजगारी, परीक्षा-पत्र लीक, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा व्यवस्था को लेकर उठ रही आवाजों ने एक बार फिर देश का ध्यान युवाओं की ओर खींचा है।
अन्ना आंदोलन जब भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था देश
वर्ष 2011 का अन्ना हजारे आंदोलन आधुनिक भारत के सबसे प्रभावशाली जनआंदोलनों में गिना जाता है। उस समय राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम विवाद और अन्य भ्रष्टाचार के मामलों ने जनता में गहरा असंतोष पैदा कर दिया था। अन्ना हजारे ने जनलोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन शुरू किया। देखते ही देखते यह आंदोलन राष्ट्रीय जनभावना का प्रतीक बन गया। दिल्ली के रामलीला मैदान से लेकर देश के छोटे-बड़े शहरों तक लाखों लोग सड़कों पर उतर आए। सबसे उल्लेखनीय बात यह थी कि इस आंदोलन का चेहरा युवा वर्ग बन गया। सोशल मीडिया के माध्यम से पहली बार किसी आंदोलन ने इतनी व्यापक जनभागीदारी देखी। बाद में इसी आंदोलन की पृष्ठभूमि से आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ।
नेपाल के युवाओं ने बदला राजनीतिक विमर्श
नेपाल का हालिया राजनीतिक इतिहास भी युवाओं की भूमिका का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक चुनौतियों, भ्रष्टाचार और बढ़ते पलायन ने वहाँ के युवाओं को निराश किया। युवाओं ने सोशल मीडिया और जनसभाओं के माध्यम से अपनी नाराजगी व्यक्त की। परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों को युवाओं के मुद्दों पर खुलकर बात करनी पड़ी। नेपाल का अनुभव यह बताता है कि जब युवाओं का असंतोष संगठित रूप ले लेता है, तो वह केवल आंदोलन नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक एजेंडा तय करने की क्षमता भी प्राप्त कर लेता है।
कॉकरोच जनता पार्टी-सोशल मीडिया से सड़क तक
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय परंपरागत राजनीतिक दलों की तरह नहीं हुआ। इसकी शुरुआत सोशल मीडिया के माध्यम से हुई और धीरे-धीरे यह युवाओं की आकांक्षाओं और असंतोष का मंच बनती दिखाई देने लगी। हाल में जंतर-मंतर पर जुटी भीड़ ने यह संकेत दिया कि यह केवल ऑनलाइन चर्चा भर नहीं है। युवाओं का एक वर्ग अब अपनी समस्याओं को सीधे सार्वजनिक मंचों पर उठाना चाहता है। यह आंदोलन किसी विचारधारा की बजाय युवाओं के रोजमर्रा के संघर्षों पर केंद्रित दिखाई देता है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और ताकत मानी जा रही है।
क्या हैं युवाओं की प्रमुख मांगें?
1. रोजगार के अवसर बढ़ें-देश में लाखों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं। कई वर्षों तक तैयारी करने के बावजूद नौकरी न मिल पाने की समस्या लगातार चर्चा में रही है।
2. भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता-युवाओं की मांग है कि सरकारी भर्ती प्रक्रियाएँ समयबद्ध और निष्पक्ष हों तथा नियुक्तियों में अनावश्यक देरी न हो।
3. पेपर लीक पर सख्ती-विभिन्न राज्यों में समय-समय पर परीक्षा प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाओं ने अभ्यर्थियों का भरोसा कमजोर किया है। युवा कठोर कानून और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।
4. शिक्षा और रोजगार में बेहतर समन्वय-युवाओं का कहना है कि शिक्षा व्यवस्था को बाजार और उद्योगों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए ताकि पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार के अवसर बढ़ सकें।
अन्ना आंदोलन और सीजेपी आंदोलन की समानताएँ
दोनों आंदोलनों के मुद्दे अलग हो सकते हैं, लेकिन उनकी प्रकृति में कई समानताएँ दिखाई देती हैं। युवाओं की केंद्रीय भूमिका, दोनों आंदोलनों की असली ताकत युवा वर्ग रहा है। सोशल मीडिया का प्रभाव, अन्ना आंदोलन के दौर में फेसबुक और ट्विटर ने भूमिका निभाई थी। आज इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म आंदोलन को गति दे रहे हैं। व्यवस्था से असंतोष, दोनों आंदोलनों की जड़ में व्यवस्था के प्रति असंतोष और सुधार की मांग निहित है। राजनीतिक विमर्श पर असर, इन आंदोलनों ने उन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया जिन पर पहले अपेक्षाकृत कम चर्चा होती थी।
फिर भी कई मायनों में अलग है यह आंदोलन
अन्ना आंदोलन का केंद्र बिंदु भ्रष्टाचार और जनलोकपाल था। उसके पास स्पष्ट नेतृत्व और एक ठोस विधायी मांग थी। इसके विपरीत सीजेपी आंदोलन रोजगार, शिक्षा और अवसरों से जुड़े अनेक प्रश्नों को एक साथ उठा रहा है। यह अभी संगठनात्मक रूप से विकसित हो रहा है और इसकी दिशा आने वाले समय में अधिक स्पष्ट होगी।
क्या यह नए राजनीतिक विकल्प का संकेत है?
भारतीय राजनीति में कई बार आंदोलनों ने नए राजनीतिक विकल्पों को जन्म दिया है। अन्ना आंदोलन से आम आदमी पार्टी निकली, जबकि जेपी आंदोलन ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक बदलाव का रास्ता बनाया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या सीजेपी आंदोलन भी भविष्य में किसी राजनीतिक विकल्प का आधार बन सकता है? इस प्रश्न का उत्तर अभी समय के गर्भ में है। लेकिन इतना निश्चित है कि यदि यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन बनाए रखता है और मजबूत संगठन विकसित करता है, तो इसका राजनीतिक प्रभाव अवश्य दिखाई देगा।
भारत का भविष्य और युवा शक्ति
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। आने वाले दशकों में देश की आर्थिक और सामाजिक दिशा इसी युवा आबादी से तय होगी। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और अवसर मिलते हैं तो भारत विश्व मंच पर और अधिक मजबूत स्थिति में पहुँच सकता है। लेकिन यदि उनकी अपेक्षाएँ लगातार अधूरी रह जाती हैं, तो असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है। यही कारण है कि युवाओं की आवाज को केवल आंदोलन या विरोध के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की चेतावनी और संभावना दोनों के रूप में देखा जाना चाहिए।
बदलाव की दस्तक या क्षणिक उभार
अन्ना आंदोलन, नेपाल के युवा आंदोलनों और कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले उभर रहे आंदोलन की परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन इन सबका मूल संदेश एक ही है-युवा अपने भविष्य को लेकर गंभीर हैं और अब अपनी बात अधिक मुखरता से कहना चाहते हैं। यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि यह आंदोलन भारत में कोई बड़ा राजनीतिक परिवर्तन ले आएगा। लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इसने रोजगार, शिक्षा, भर्ती व्यवस्था और युवाओं के भविष्य को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है। लोकतंत्र में परिवर्तन हमेशा सत्ता परिवर्तन से नहीं आते। कई बार परिवर्तन की शुरुआत उन सवालों से होती है जिन्हें अनदेखा करना अब संभव नहीं रह जाता। जंतर-मंतर से उठती युवाओं की आवाज शायद ऐसे ही किसी नए अध्याय की प्रस्तावना हो।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
