साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं, बल्कि मनुष्य की संवेदनाओं, संघर्षों और समय की चेतना का दस्तावेज होता है। किंतु पिछले कुछ दशकों में साहित्य की दुनिया को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न उठे हैं। क्या साहित्य अब भी समाज की पीड़ा और यथार्थ का प्रतिनिधित्व कर रहा है, या वह पुरस्कारों, प्रतिष्ठानों, गुटों और प्रचार के जाल में उलझता जा रहा है? इसी संदर्भ में कुछ आलोचक और पाठक व्यंग्य में ‘कॉकरोची साहित्य’ जैसी संज्ञा का प्रयोग करने लगे हैं। यह शब्द भले ही साहित्यिक शब्दावली का हिस्सा न हो, किंतु इसके पीछे की चिंता गंभीर है। आशय उस लेखन से है जो किसी भी परिस्थिति में स्वयं को बचाए रखने, हर सत्ता और हर प्रवृत्ति के साथ तालमेल बैठाने तथा सृजनात्मक जोखिम लेने के बजाय सुविधाजनक रास्ते चुनने लगता है।
साहित्य के बाजारीकरण पर पुरानी चिंताएँ
साहित्य में बाजार के हस्तक्षेप को लेकर चिंता कोई नई नहीं है। हिंदी के महान आलोचक रामविलास शर्मा ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि साहित्य का संबंध जनता के जीवन से होना चाहिए, न कि केवल प्रतिष्ठा और उपभोग से। प्रख्यात आलोचक नामवर सिंह ने भी कई अवसरों पर कहा कि साहित्य में विचार और रचना की जगह यदि केवल खेमेबाजी और प्रतिष्ठानवाद ले लें, तो साहित्य की स्वायत्तता संकट में पड़ जाती है। विश्व साहित्य में भी ऐसी चिंताएँ व्यक्त हुई हैं। प्रसिद्ध लेखक जाॅर्ज ओरवल ने लिखा था कि लेखक का सबसे बड़ा दायित्व सत्य के प्रति ईमानदार रहना है। जब लेखन सत्ता, प्रचार या निजी लाभ का उपकरण बन जाता है, तब उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
पुरस्कार, प्रतिष्ठा और गुटबाजी
समकालीन साहित्य की सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक गुटबाजी है। कई साहित्यिक मंचों, पत्रिकाओं और पुरस्कारों को लेकर समय-समय पर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। वरिष्ठ हिंदी कवि केदारनाथ सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था कि साहित्य में संवाद आवश्यक है, किंतु जब समूह रचना से बड़ा हो जाए तो समस्या पैदा होती है। साहित्यिक इतिहास बताता है कि हर युग में गुट बने हैं, परंतु सोशल मीडिया के दौर में यह प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। अब लेखक की रचना से पहले उसकी डिजिटल उपस्थिति, प्रचार-क्षमता और नेटवर्क पर चर्चा होने लगी है। इससे नए और गंभीर लेखकों के सामने अतिरिक्त चुनौतियाँ खड़ी होती हैं।
सोशल मीडिया का साहित्य
डिजिटल युग ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी रचनाएँ प्रकाशित कर सकता है। यह सकारात्मक परिवर्तन है। लेकिन इसके साथ कुछ समस्याएँ भी सामने आई हैं। तत्काल प्रसिद्धि की चाह में कई बार अधपकी रचनाएँ भी व्यापक प्रचार पा जाती हैं। लाइक, शेयर और फॉलोअर्स को साहित्यिक गुणवत्ता का पैमाना मान लिया जाता है। परिणामस्वरूप गहन अध्ययन, भाषा की साधना और वैचारिक तैयारी जैसी प्रक्रियाएँ पीछे छूटने लगती हैं। प्रख्यात चिंतक टीएस इलियट का मानना था कि परंपरा और अध्ययन के बिना साहित्यिक उत्कृष्टता संभव नहीं। आज यह प्रश्न पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
क्या पाठक भी जिम्मेदार हैं?
साहित्य की स्थिति के लिए केवल लेखक या संस्थाएँ ही जिम्मेदार नहीं हैं। पाठक समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जब पाठक गंभीर पुस्तकों के बजाय केवल चर्चित नामों तक सीमित हो जाते हैं, तब प्रकाशक और साहित्यिक संस्थाएँ भी उसी दिशा में झुकने लगती हैं। बाजार अंततः मांग का अनुसरण करता है। भारत में पुस्तक-पठन की संस्कृति पर कई अध्ययन बताते हैं कि मनोरंजन और त्वरित सामग्री की खपत बढ़ी है, जबकि गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग अपेक्षाकृत सीमित हुआ है। ऐसे में साहित्यिक गुणवत्ता और लोकप्रियता के बीच संतुलन का प्रश्न और जटिल हो जाता है।
फिर भी उम्मीद बाकी है
समकालीन साहित्य की आलोचना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है उसके सकारात्मक पक्ष को भी देखना। आज हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में अनेक युवा लेखक ग्रामीण जीवन, पर्यावरण, स्त्री-अनुभव, दलित प्रश्न, आदिवासी समाज, प्रवासी जीवन और तकनीकी बदलावों पर गंभीर लेखन कर रहे हैं। अनेक छोटी पत्रिकाएँ और स्वतंत्र प्रकाशन संस्थाएँ भी गुणवत्तापूर्ण साहित्य को मंच दे रही हैं। ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी जैसे मंचों से सम्मानित अनेक रचनाएँ यह साबित करती हैं कि साहित्य की मुख्य धारा में अभी भी गंभीरता और सृजनात्मकता जीवित है।
‘कॉकरोची साहित्य’-एक रूपक, एक चेतावनी
यदि ‘कॉकरोची साहित्य’ शब्द का प्रयोग किया जाए तो उसे पूरे साहित्य की परिभाषा नहीं, बल्कि एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए। यह उस प्रवृत्ति की आलोचना है जिसमें रचना की जगह संबंध, विचार की जगह प्रचार, और साहित्य की जगह साहित्यिक कारोबार प्रमुख हो जाता है। सच्चा साहित्य हमेशा जोखिम उठाता है। वह सत्ता से प्रश्न करता है, समाज के अंतर्विरोधों को उजागर करता है और मनुष्य की संवेदनाओं को विस्तार देता है। इसके विपरीत सुविधाजनक लेखन हर परिस्थिति में स्वयं को सुरक्षित रखने का प्रयास करता है। साहित्य का संकट केवल साहित्य का संकट नहीं, बल्कि समाज की बौद्धिक चेतना का संकट भी है। यदि हम चाहते हैं कि साहित्य अपनी गरिमा बनाए रखे, तो लेखकों को ईमानदार सृजन, आलोचकों को निष्पक्ष मूल्यांकन, संस्थाओं को पारदर्शिता और पाठकों को गंभीर पठन की संस्कृति अपनानी होगी। अन्यथा वह समय दूर नहीं जब रचना की गुणवत्ता से अधिक उसकी मार्केटिंग पर चर्चा होगी, और साहित्य के बारे में यह व्यंग्य बार-बार सुनाई देगा कि यहाँ शब्दों से अधिक ‘जीवित बने रहने की कला’ का सम्मान हो रहा है।
आज का साहित्य-एक नजर में
1-साहित्य में गुटबाजी और पुरस्कार राजनीति पर बहस नई नहीं है।
2-सोशल मीडिया ने लेखन को लोकतांत्रिक बनाया, लेकिन तात्कालिकता भी बढ़ाई।
3-हिंदी के कई वरिष्ठ आलोचक साहित्य की स्वायत्तता और गुणवत्ता पर चिंता जता चुके हैं।
4-गंभीर साहित्य का पाठक वर्ग सीमित होने से बाजार-प्रधान प्रवृत्तियाँ मजबूत हुई हैं।
5-आज भी भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता का साहित्य निरंतर लिखा जा रहा है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(पत्रकार एवं लेखक)
