भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल आर्थिक विषय नहीं रह गई हैं, बल्कि वे राजनीति, चुनाव और जनभावनाओं से भी गहराई से जुड़ चुकी हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के समाप्त होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई वृद्धि ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या भारत में ईंधन मूल्य निर्धारण वास्तव में पूरी तरह आर्थिक आधार पर होता है, या फिर चुनावी राजनीति भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है।
15 मई 2026 को देशभर में पेट्रोल और डीजल के दामों में 3 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे महानगरों में कीमतें नए स्तर पर पहुंच गईं। कोलकाता में पेट्रोल 108 रुपये प्रति लीटर के पार चला गया। तेल कंपनियों ने इसका कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, पश्चिम एशिया में तनाव और लगातार हो रहे घाटे को बताया। सरकार का पक्ष भी यही रहा कि यह निर्णय परिस्थितियों की मजबूरी में लिया गया।
लेकिन विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों ने इस वृद्धि को सीधे पश्चिम बंगाल चुनाव से जोड़ दिया। चुनाव के दौरान लगातार यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि मतदान समाप्त होते ही पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव समाप्ति से पहले ही कहा था कि “चुनावी राहत खत्म होते ही महंगाई बढ़ेगी।” उस समय सरकार ने इन दावों को खारिज कर दिया था, किंतु चुनाव समाप्त होने के कुछ ही दिनों बाद कीमतों में वृद्धि ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे दिया।
दरअसल भारत में ईंधन की कीमतें हमेशा से राजनीतिक संवेदनशीलता का विषय रही हैं। पेट्रोल-डीजल सीधे जनता की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं। इनकी कीमत बढ़ते ही केवल वाहन चलाना महंगा नहीं होता, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाद्यान्न, सब्जियां, दूध, निर्माण सामग्री और लगभग हर आवश्यक वस्तु की कीमत प्रभावित होती है। इसी कारण अर्थशास्त्री पेट्रोलियम उत्पादों को “महंगाई की जननी” तक कहते हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी रिपोर्टों में ईंधन कीमतों को महंगाई का बड़ा कारण मानता रहा है। ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में थोड़ी सी उथल-पुथल का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, होर्मुज पर संकट पैदा होता है या कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भारी दबाव पड़ता है।
लेकिन इस पूरे मामले का दूसरा पक्ष राजनीतिक अर्थशास्त्र का है। भारत में यह धारणा लंबे समय से बनी हुई है कि चुनावों के दौरान सरकारें पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने का प्रयास करती हैं ताकि जनता में असंतोष न बढ़े। कई बार तेल कंपनियां घाटा सहन करती हैं या सरकार टैक्स संरचना में अस्थायी राहत देती है। चुनाव समाप्त होते ही कीमतों में एकमुश्त वृद्धि देखने को मिलती है। यही कारण है कि पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद हुई ताजा वृद्धि को भी उसी परंपरा से जोड़कर देखा जा रहा है।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। वर्ष 2012 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार के समय पेट्रोल की कीमतों में भारी वृद्धि हुई थी। उस समय भी विपक्ष ने आरोप लगाया था कि चुनाव तक दाम कृत्रिम रूप से रोके गए। इसी प्रकार 2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लंबे समय तक स्थिरता रही, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही पुनः वृद्धि शुरू हो गई।
सबसे चर्चित उदाहरण 2022 का रहा, जब उत्तर प्रदेश सहित पाँच राज्यों के चुनाव समाप्त होने के तुरंत बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में लगातार कई दिनों तक वृद्धि की गई। उस समय देश के अनेक शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया था। रसोई गैस सिलेंडर भी महंगे हुए थे। विपक्ष ने तब भी केंद्र सरकार पर चुनाव तक जनता को राहत देने और बाद में बोझ डालने का आरोप लगाया था।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाकर राहत दी थी। कई आर्थिक विश्लेषकों ने इसे चुनावी रणनीति बताया। हालांकि सरकार का तर्क था कि वह जनता को वैश्विक महंगाई से राहत देना चाहती है।
सच्चाई यह है कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में आर्थिक निर्णयों को पूरी तरह राजनीति से अलग करके देखना कठिन है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें केवल बाजार का प्रश्न नहीं, बल्कि जनभावना और चुनावी समीकरणों का भी हिस्सा बन चुकी हैं। सरकारें चाहें किसी भी दल की हों, वे जनता पर अचानक आर्थिक बोझ डालने से पहले राजनीतिक समय का ध्यान अवश्य रखती हैं।
फिर भी सरकार का पक्ष पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में तेल बाजार अस्थिर है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया तनाव और वैश्विक आपूर्ति संकट ने ऊर्जा बाजार को प्रभावित किया है। तेल कंपनियां लगातार यह कह रही हैं कि यदि कीमतें नहीं बढ़ाई जाएंगी तो उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ेगा। सरकार यह भी दावा कर रही है कि उसने कई बार टैक्स कम करके राहत दी है और भारत में अभी भी कई देशों की तुलना में ईंधन कीमतें नियंत्रित हैं।
इसके साथ ही सरकार वैकल्पिक ऊर्जा, इथेनॉल मिश्रण और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की नीति पर भी जोर दे रही है ताकि भविष्य में तेल आयात पर निर्भरता कम हो सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार “डॉलर बचाओ” और “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” की बात कर चुके हैं। उनका तर्क है कि यदि भारत तेल आयात पर कम निर्भर होगा तो देश की अर्थव्यवस्था अधिक मजबूत होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
अंततः पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद पेट्रोल-डीजल मूल्य वृद्धि ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में महंगाई और राजनीति का संबंध बेहद गहरा है। आर्थिक मजबूरियां अपनी जगह हैं, लेकिन जनता यह भी देखती है कि कीमतें कब बढ़ती हैं और कब रोकी जाती हैं। यही कारण है कि हर बार चुनाव समाप्त होने के बाद ईंधन मूल्य वृद्धि पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो जाता है।
आज आवश्यकता केवल कीमतों को नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि ऐसी दीर्घकालिक ऊर्जा नीति बनाने की है जो भारत को आयातित तेल पर निर्भरता से मुक्त कर सके। अन्यथा हर चुनाव के बाद “महंगाई बम” भारतीय राजनीति और आम जनता दोनों के लिए चिंता का विषय बना रहेगा।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
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