भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न स्वर्गीय श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का जीवन सादगी, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उनका व्यक्तित्व और विचार आज भी देशवासियों, विशेषकर युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों को निकट से जानना और सुनना किसी भी व्यक्ति के लिए गौरव और सौभाग्य का विषय है।
इसी क्रम में उनके सुपुत्र श्री सुनील शास्त्री जी से हिंदी अकादमी, दिल्ली के पूर्व उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा की एक विशेष एवं आत्मीय मुलाकात हुई । इस अवसर पर लंबी बातचीत के दौरान श्री सुनील शास्त्री जी ने अपने पिता स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन से जुड़े अनेक रोचक, आत्मीय और प्रेरणादायक संस्मरण साझा किए। इन प्रसंगों के माध्यम से शास्त्री जी के सार्वजनिक जीवन के साथ-साथ उनके पारिवारिक जीवन, सहज व्यवहार, मानवीय संवेदनाओं और अनुशासित जीवनशैली को समझने का अवसर मिला। ऐसा लग रहा था मानो उनके संस्मरणों के माध्यम से इतिहास के पन्नों में दर्ज एक महान व्यक्तित्व हमारे सामने सजीव हो उठा हो।
ऋषि कुमार शर्मा ने, श्री सुनील शास्त्री जी से दो विशेष जिज्ञासाएँ भी साझा कीं। पहली जिज्ञासा शास्त्री जी के विद्यार्थी जीवन से जुडी जब शास्त्री जी विद्यालय में पढ़ते थे, तब वे नदी पार करके स्कूल जाया करते थे। उस समय के उनके संघर्ष, साहस और शिक्षा के प्रति समर्पण से जुड़े अनुभवों को जानना ।
दूसरी शास्त्री जी के उस संकल्प के संदर्भ में किया, जिसमें उन्होंने एक दिन भोजन न करने का प्रण लिया था। शास्त्री जी नें बताया यह केवल एक परंपरा का पालन नहीं, बल्कि शास्त्री जी के विचारों, उनके जीवन-दर्शन, आत्मानुशासन और भारत के प्रति उनकी गहरी आस्था को समझने तथा उनसे आत्मिक रूप से जुड़ने का एक माध्यम था । इस संकल्प के माध्यम से मुझे भी उनके आदर्शों के निकट आने और उनके व्यक्तित्व को आत्मसात करने की प्रेरणा मिलती है।
इस विशेष मुलाकात के दौरान श्री अशोक गुप्ता जी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि श्री सुनील शास्त्री जी द्वारा साझा किए गए संस्मरण इतने रोचक, प्रेरणादायक और ऐतिहासिक महत्त्व के हैं कि हम चाहते हैं कि इन संस्मरणों को सुन-सुनकर एक नई पुस्तक का प्रकाशन किया जाए, ताकि ये अनमोल प्रसंग आने वाली पीढ़ियों तक पहुँच सकें।
वहीं श्री राजीव रोहिला जी ने कहा कि लाल बहादुर शास्त्री जी के जीवन से जुड़े अनेक प्रसंगों को श्री सुनील शास्त्री जी के मुख से सुनकर वे अत्यंत अभिभूत हुए।
इस अवसर पर आनंद बक्शी साहब पर लिखी पुस्तक "नग्मे किस्से यादें बातें " और समीर गांगुली की पुस्तक"भारत रत्न"भी सुनील शास्त्री जी को भेंट की गई।
निस्संदेह, श्री सुनील शास्त्री जी के सान्निध्य में बिताया गया यह समय केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कार, विचार और राष्ट्रभक्ति की अनमोल पाठशाला जैसा अनुभव रहा। कुछ मुलाकातें स्मृतियों में ही नहीं बसतीं, बल्कि जीवन के विचारों और दृष्टिकोण को भी समृद्ध करती हैं। यह मुलाकात निश्चित रूप से ऐसी ही एक अविस्मरणीय अनुभूति रही।
अंत में से सुनील शास्त्री जी ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।

