दीपावली भारतीय संस्कृति का ऐसा महापर्व है, जिसका इंतजार हर उम्र के लोगों को वर्ष भर रहता है। दीपों की जगमगाहट, घरों की सजावट, रंग-बिरंगी रंगोलियां, मिठाइयों की खुशबू, पूजा-अर्चना और अपनों से मिलने-जुलने की परंपरा इस त्योहार को विशेष बनाती है। दीपावली केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश, असत्य पर सत्य और निराशा पर आशा की विजय का प्रतीक भी है। यह पर्व हमें प्रेम, सद्भाव, भाईचारे और सकारात्मकता का संदेश देता है। लेकिन बदलते समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। आतिशबाजी, महंगे उपहारों, दिखावे और अत्यधिक खर्च ने त्योहार की परंपरागत सादगी को काफी हद तक प्रभावित किया है। उत्साह और उल्लास के बीच कई बार हम उन सावधानियों को नजरअंदाज कर देते हैं, जिनका ध्यान रखना बेहद आवश्यक है। आज जब दिल्ली-एनसीआर जैसे महानगर पहले से ही प्रदूषण, यातायात और अग्नि दुर्घटनाओं की चुनौतियों से जूझ रहे हैं, तब दीपावली की खुशियों के साथ जिम्मेदारी का भाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
अग्निकांड के आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं
दीपावली के अवसर पर पटाखे और रोशनी जहां उत्सव का आकर्षण होते हैं, वहीं थोड़ी सी लापरवाही बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। दिल्ली अग्निशमन सेवा के आंकड़े इस चिंता को गंभीर बनाते हैं। वर्ष 2021 में दीपावली पर 152 आपातकालीन कॉल दर्ज की गईं, वर्ष 2022 में यह संख्या 201 और 2023 में 208 रही। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा बढ़कर 318 तक पहुंच गया। इनमें 280 कॉल आग लगने की घटनाओं से संबंधित थीं। दिल्ली अग्निशमन सेवा के अनुसार, यह वर्ष 2012 के बाद दीपावली पर प्राप्त सर्वाधिक आपातकालीन कॉल का आंकड़ा था। गाजियाबाद की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं रही। वर्ष 2024 की दीपावली पर जिले के अग्निशमन विभाग को आग से संबंधित 60 कॉल मिलीं, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या केवल 23 थी। अधिकारियों के अनुसार, अधिकांश घटनाओं के पीछे पटाखे, लापरवाही से जलाए गए दीपक और मोमबत्तियां तथा कुछ मामलों में शॉर्ट सर्किट जैसे कारण थे। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि दीपावली पर अग्नि सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता है। पटाखे चलाते समय बच्चों को अकेला न छोड़ें। खुले स्थान का चुनाव करें और घरों, दुकानों, वाहनों तथा ज्वलनशील वस्तुओं से पर्याप्त दूरी रखें। पानी की बाल्टी और प्राथमिक उपचार की व्यवस्था रखें। अधजले पटाखों को दोबारा जलाने का प्रयास न करें। आतिशबाजी के दौरान सूती कपड़े पहनना अधिक सुरक्षित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पटाखों की खुशी किसी दूसरे के लिए भय और परेशानी का कारण न बने।
प्रदूषण उत्सव के बाद की सबसे बड़ी चुनौती
दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के आसपास वायु प्रदूषण का स्तर चिंता का विषय बन जाता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग के आंकड़े इस स्थिति को समझने में मदद करते हैं। दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक दीपावली से पहले, दीपावली के दिन और उसके अगले दिन इस प्रकार दर्ज किया गया-
वर्ष दीपावली से पहले दीपावली के दिन अगले दिन
2018 338 281 390
2019 287 337 368
2020 339 414 435
2021 314 382 462
2022 229 312 302
2023 220 218 358
इन आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020 में दीपावली के अगले दिन दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक 435 और वर्ष 2021 में वायु गुणवत्ता सूचकांक 462 तक पहुंच गया था। वर्ष 2023 में दीपावली के दिन वायु गुणवत्ता सूचकांक 218 रहा, लेकिन अगले दिन यह बढ़कर 358 हो गया। इससे स्पष्ट होता है कि दीपावली के आसपास वायु गुणवत्ता में कई बार तेजी से गिरावट आती है। हालांकि यह समझना भी आवश्यक है कि प्रदूषण का एकमात्र कारण पटाखे नहीं हैं। पराली जलाना, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण कार्यों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसम की परिस्थितियां भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
वैज्ञानिक शोध भी कर रहे हैं आगाह
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली के शोधकर्ताओं ने दीपावली के दौरान और उसके बाद दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि दीपावली के दौरान पीएम 2.5 में धातुओं की मात्रा में लगभग 1100 प्रतिशत तक वृद्धि हुई और उस समय मौजूद धातु संबंधी पीएम 2.5 का लगभग 95 प्रतिशत हिस्सा आतिशबाजी से जुड़ा था। इस शोध के प्रमुख लेखक चिराग मनचंदा ने बताया कि आतिशबाजी का प्रभाव लगभग 12 घंटे बाद काफी कम हो जाता है। वहीं शोध दल के सदस्य और आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर विक्रम सिंह ने बताया कि दीपावली के बाद पराली तथा अन्य जैविक ईंधन के जलने से निकलने वाले उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। इस अध्ययन के प्रमुख अन्वेषक प्रोफेसर मयंक कुमार ने भी स्पष्ट किया कि दिल्ली में दीपावली के बाद वायु प्रदूषण को समझने के लिए उसके विभिन्न स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी है। यह शोध हमें एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि प्रदूषण की समस्या बहुआयामी है। इसके समाधान के लिए पटाखों पर नियंत्रण के साथ-साथ पराली प्रबंधन, स्वच्छ ईंधन, सार्वजनिक परिवहन और औद्योगिक प्रदूषण पर नियंत्रण भी आवश्यक है।
स्वास्थ्य से बड़ा कोई उत्सव नहीं
पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इनका प्रभाव विशेष रूप से बच्चों, बुजुर्गों, हृदय रोगियों और सांस संबंधी समस्याओं से परेशान लोगों पर पड़ता है। पटाखों का धुआं आंखों में जलन, खांसी, सांस लेने में परेशानी और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है। तेज आवाज वाले पटाखे पशु-पक्षियों के लिए भी कष्टदायक होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी वायु प्रदूषण को मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम मानता है। उसके अनुसार सूक्ष्म कणों का संपर्क हृदय और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों का खतरा बढ़ा सकता है। हमें यह समझना होगा कि उत्सव मनाने का अर्थ प्रकृति और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना नहीं है। मिट्टी के दीपक जलाएं, पारंपरिक सजावट को प्रोत्साहन दें, बिजली की अनावश्यक खपत कम करें और पटाखों से यथासंभव दूरी बनाएं। यदि आतिशबाजी करें तो निर्धारित नियमों और समय-सीमा का पालन करें तथा केवल अनुमत और प्रमाणित ग्रीन पटाखों का ही इस्तेमाल करें।
सामाजिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता भी जरूरी
दीपावली खुशियों का पर्व है, प्रतिस्पर्धा और दिखावे का नहीं। अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार खर्च करें और जरूरतमंदों की सहायता करें। गरीब बच्चों को मिठाइयां, वस्त्र और उपहार देकर उनके जीवन में भी खुशियों का दीप जलाएं। पटाखों के शोर से परेशान होने वाले बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और छोटे बच्चों का ध्यान रखें। पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाएं। सोशल मीडिया पर फैलने वाली भ्रामक सूचनाओं और ऑनलाइन ठगी से भी सावधान रहें। महात्मा गांधी का विचार था कि पृथ्वी हर मनुष्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन देती है, लेकिन हर मनुष्य के लालच के लिए नहीं। यह विचार आज के उपभोक्तावादी दौर और पर्यावरण संकट के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। दीपावली का वास्तविक अर्थ केवल घरों में दीप जलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर सद्भाव, संवेदना और मानवता का प्रकाश जगाना भी है। रवींद्रनाथ टैगोर की साहित्यिक दृष्टि में प्रकाश आशा, चेतना और जीवन की सकारात्मकता का प्रतीक रहा है। दीपावली का प्रकाश भी तभी सार्थक है, जब वह हमारे भीतर संवेदना, विवेक और जिम्मेदारी का उजाला पैदा करे। आइए, इस दीपावली पर संकल्प लें कि खुशियां मनाएंगे, लेकिन किसी के स्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरे में डालकर नहीं। पर्यावरण का संरक्षण करेंगे, जरूरतमंदों की सहायता करेंगे और अपनी परंपराओं को आधुनिक जिम्मेदारियों के साथ आगे बढ़ाएंगे। ’’क्योंकि दीपावली की सार्थकता पटाखों के शोर में नहीं, बल्कि जीवन में खुशियों, प्रेम, सद्भाव और स्वच्छ वातावरण के प्रकाश में है।’’
-डॉ. चेतन आनंद
(कवि, पत्रकार एवं प्रकाशक)

