मनुष्य की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अक्सर दूसरों से आगे निकलने की होती है। कोई धन में आगे बढ़ना चाहता है, कोई पद में, कोई प्रतिष्ठा में और कोई प्रसिद्धि में। हम दुनिया को जीतने के लिए अनेक योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि सबसे कठिन विजय बाहर नहीं, भीतर की होती है। अपने क्रोध, भय, आलस्य, अहंकार, लालच, निराशा और नकारात्मक विचारों पर नियंत्रण पाना ही वास्तविक आत्मविजय है। महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद, गौतम बुद्ध, चाणक्य, सुकरात और मार्कस ऑरेलियस जैसे चिंतकों ने अलग-अलग ढंग से आत्मसंयम, आत्मनिरीक्षण और अनुशासन को जीवन की महत्वपूर्ण शक्तियाँ माना। वास्तव में जिसने स्वयं को जीत लिया, उसके लिए बाहरी परिस्थितियों से संघर्ष करना कहीं आसान हो जाता है। आइए जानते हैं स्वयं को जीतने की दस ऐसी ट्रिक्स, जिन्हें जीवन में उतारकर हम अपने व्यक्तित्व को अधिक मजबूत और संतुलित बना सकते हैं।
1. प्रतिक्रिया देने से पहले रुकिए
हमारे जीवन की अनेक परेशानियाँ परिस्थितियों से कम और हमारी तत्काल प्रतिक्रियाओं से अधिक पैदा होती हैं। किसी ने कुछ कह दिया, हमें बुरा लगा और हमने उसी क्षण जवाब दे दिया। बाद में पछतावा हुआ कि थोड़ा रुक जाते तो बात बिगड़ती नहीं। महात्मा गांधी के जीवन में आत्मसंयम का विशेष महत्व था। उनका जीवन यह सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में प्रतिक्रिया से पहले विवेक को अवसर देना चाहिए। जब भी क्रोध आए, तुरंत उत्तर न दें। दस तक गिनें, गहरी साँस लें और फिर सोचकर बोलें। कई बार कुछ क्षणों का मौन वर्षों के रिश्ते बचा लेता है।
2. अपने मन को नियंत्रित करना सीखिए
स्वामी विवेकानंद ने मन की शक्ति और एकाग्रता को जीवन की सफलता से जोड़ा। मन यदि हमारे नियंत्रण में है तो वह हमारी सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन यदि हम मन के नियंत्रण में हैं तो वही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाता है। मन कभी कहेगा कि आज काम मत करो, कल कर लेना। कभी कहेगा कि यह काम तुमसे नहीं होगा। कभी दूसरों की सफलता देखकर निराश करेगा। ऐसे समय में मन से कहिए-“निर्णय मैं करूँगा, मेरा मन नहीं।”
3. हर विचार को सच मत मानिए
गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में विचारों और मन की गतिविधियों को देखने की विशेष महत्ता है। हमारे मन में दिनभर हजारों विचार आते हैं, लेकिन हर विचार सत्य नहीं होता। कभी हमें लगता है कि सब लोग हमारे विरुद्ध हैं। कभी लगता है कि हम असफल हो जाएँगे। कभी किसी छोटी समस्या को हम बहुत बड़ा बना लेते हैं। जब कोई नकारात्मक विचार आए तो स्वयं से पूछिए-“क्या यह तथ्य है या केवल मेरी आशंका?” यह छोटा-सा प्रश्न आपको कई अनावश्यक चिंताओं से बचा सकता है।
4. दूसरों से नहीं, स्वयं से प्रतिस्पर्धा कीजिए
आज के समय में तुलना मनुष्य की मानसिक शांति की बड़ी दुश्मन बन गई है। किसी की बड़ी उपलब्धि देखकर हमें अपनी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं। किसी की संपत्ति देखकर अपनी आर्थिक स्थिति कमजोर लगती है और किसी की प्रसिद्धि देखकर अपनी पहचान कम लगती है। लेकिन हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है। डेल कार्नेगी ने भी मानवीय व्यवहार के संदर्भ में तुलना और अनावश्यक चिंता से बचने की बात कही है। इसलिए दूसरों से तुलना छोड़कर स्वयं से पूछिए-“क्या मैं आज कल से थोड़ा बेहतर हूँ?” यदि उत्तर हाँ है, तो आप सही दिशा में हैं।
5. जरूरत पड़ने पर ‘नहीं’ कहना सीखिए
हर व्यक्ति को खुश करना संभव नहीं है। फिर भी हम अक्सर दूसरों की अपेक्षाओं के बोझ में अपनी जरूरतों और इच्छाओं को पीछे कर देते हैं। चाणक्य के विचारों में समय, ऊर्जा और विवेक के उचित उपयोग को विशेष महत्व मिलता है। जीवन में यह समझना आवश्यक है कि कहाँ हमारा समय लगना चाहिए और कहाँ नहीं। विनम्रता से ‘नहीं’ कहना सीखिए। हर निमंत्रण स्वीकार करना, हर समस्या अपने सिर लेना और हर व्यक्ति को प्रसन्न करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।
6. आलोचना को अपने विकास का माध्यम बनाइए
आलोचना सुनना किसी को पसंद नहीं होता। लेकिन हर आलोचना शत्रुता नहीं होती। कई बार आलोचना हमारे व्यक्तित्व का वह पक्ष दिखा देती है जिसे हम स्वयं नहीं देख पाते। सुकरात का दर्शन आत्मपरीक्षण और स्वयं को जानने पर आधारित था। इसलिए आलोचना सुनते समय पहले यह देखिए कि उसमें कितनी सच्चाई है। यदि आलोचना सही है तो सुधार कीजिए। यदि गलत है तो उसे अपने मन पर बोझ मत बनने दीजिए। हर आलोचक को जवाब देना जरूरी नहीं है। कई बार आपका बेहतर व्यवहार ही सबसे अच्छा उत्तर होता है।
7. काम टालने की आदत पर विजय पाइए
‘कल से शुरू करेंगे’-यह छोटा-सा वाक्य हमारी अनेक संभावनाओं को खत्म कर देता है। काम कठिन लगता है तो मन बहाने बनाने लगता है। बेंजामिन फ्रैंकलिन ने समय और अनुशासन के महत्व पर बहुत जोर दिया। जीवन में सफलता का एक महत्वपूर्ण नियम है-काम को टालिए मत, शुरुआत कीजिए। यदि कोई काम बहुत बड़ा लग रहा है तो उसे छोटे हिस्सों में बाँटिए। स्वयं से कहिए-“मैं केवल पाँच मिनट शुरू करता हूँ।” अक्सर शुरुआत होते ही काम आसान लगने लगता है।
8. अपनी कमजोरियों को स्वीकार कीजिए
हर व्यक्ति में कुछ खूबियाँ होती हैं और कुछ कमजोरियाँ। समस्या कमजोरी होने में नहीं, उसे स्वीकार न करने में है। मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग के विचारों में व्यक्ति के भीतर छिपे पक्षों को पहचानने और समझने की बात महत्वपूर्ण है। जो व्यक्ति अपनी कमजोरी पहचान लेता है, वह उसे सुधारने की दिशा में पहला कदम उठा चुका होता है। अपनी तीन प्रमुख कमजोरियाँ लिखिए और प्रत्येक के लिए एक छोटा सुधारात्मक कदम तय कीजिए। आत्मस्वीकार आत्मविकास की पहली सीढ़ी है।
9. प्रतिदिन स्वयं से संवाद कीजिए
हम दिनभर दूसरों की बातें सुनते हैं-समाचार, मोबाइल, सामाजिक माध्यम, मित्र, परिवार और कार्यस्थल। लेकिन क्या हम कभी स्वयं की आवाज सुनते हैं? माक्र्स ऑरेलियस जैसे दार्शनिकों ने आत्मनिरीक्षण और आत्मअनुशासन को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। रात को दस मिनट अकेले बैठिए और तीन प्रश्न पूछिए-आज मैंने क्या अच्छा किया? आज मुझसे कहाँ गलती हुई? कल मैं क्या बेहतर कर सकता हूँ? यदि इन तीन प्रश्नों का ईमानदारी से उत्तर देने की आदत पड़ जाए तो व्यक्तित्व में धीरे-धीरे बड़ा परिवर्तन आ सकता है।
10. अपने सिद्धांतों और आत्मसम्मान से समझौता मत कीजिए
जीवन में धन, पद और प्रसिद्धि महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन इनसे बड़ा है आत्मसम्मान। यदि किसी सफलता के लिए हमें अपने सिद्धांत बेचने पड़ें तो वह सफलता वास्तव में असफलता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जीवन हमें लक्ष्य, अनुशासन और मूल्यों के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। किसी भी बड़े निर्णय से पहले स्वयं से एक सवाल पूछिए-“क्या इस निर्णय के बाद भी मैं अपनी नजरों में सम्मानित रहूँगा?” यदि उत्तर ‘हाँ’ है तो आगे बढ़िए। यदि भीतर से आवाज ‘नहीं’ कह रही है तो एक बार फिर विचार कीजिए।
सबसे बड़ी जीत स्वयं पर विजय है
स्वयं को जीतना एक दिन का काम नहीं है। यह प्रतिदिन का अभ्यास है। कभी हम क्रोध पर विजय पाएँगे, कभी आलस्य पर, कभी भय पर और कभी अपनी नकारात्मक सोच पर। कई बार हम असफल भी होंगे। लेकिन असली आत्मविजय यह है कि असफल होने के बाद भी हम स्वयं को फिर संभाल लें। दूसरों को जीतने के लिए शक्ति की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन स्वयं को जीतने के लिए अनुशासन, धैर्य और आत्मबोध चाहिए। दुनिया में सबसे कठिन मुकाबला किसी दूसरे व्यक्ति से नहीं, अपने ही मन से होता है। जिस दिन मनुष्य अपने मन का स्वामी बन जाता है, उस दिन बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव बहुत कम हो जाता है। इसलिए अगली बार जब आप किसी को हराने या किसी से आगे निकलने की कोशिश करें, तो कुछ क्षण रुककर अपने भीतर झाँकिए और स्वयं से पूछिए-“क्या मैंने स्वयं को जीत लिया है?” क्योंकि जिसने स्वयं को जीत लिया, उसके लिए दुनिया को जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं रह जाता। अपने मन को आदेश देना सीखिए, मन के आदेश पर चलना नहीं, यही आत्मविजय का सबसे सरल सूत्र है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)

