भारत आज युवा देश है। 15 से 25 वर्ष की आयु के करोड़ों युवा हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं और यदि व्यापक आयु-समूह को देखें तो यह संख्या और भी बड़ी हो जाती है। यही युवा आने वाले भारत की दिशा और दशा तय करेंगे। इसलिए उनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, उचित प्रशिक्षण, संस्कार और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। यदि हम इस चुनौती को सही ढंग से स्वीकार कर लें तो यही चुनौती भारत के लिए सबसे बड़ा वरदान सिद्ध हो सकती है।
शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं
आज हमारे पास ज्ञान प्राप्त करने के साधनों की कोई कमी नहीं है। विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय अपने-अपने स्तर पर पाठ्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षित कर रहे हैं। विषय-वस्तु समझने के लिए पुस्तकालय, इंटरनेट, यू-ट्यूब, गूगल और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे अनेक संसाधन विद्यार्थियों की पहुँच में हैं। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि विद्यार्थी को जानकारी कहाँ से मिलेगी; वास्तविक प्रश्न यह है कि उस जानकारी का उपयोग वह अपने जीवन, समाज और राष्ट्र के लिए किस प्रकार करेगा। केवल कला, विज्ञान, वाणिज्य, तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा अथवा कौशल विकास की औपचारिक शिक्षा लेकर छोटी-मोटी नौकरी प्राप्त कर लेना किसी विद्यार्थी को पूर्ण अर्थों में जिम्मेदार नागरिक नहीं बना देता। शिक्षा का उद्देश्य उससे कहीं व्यापक है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को आत्मविश्वासी, आत्मनिर्भर, संवेदनशील, अनुशासित और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाए। यहीं से कर्मठ अध्यापक की भूमिका प्रारंभ होती है।
हमें विषय पढ़ाने वाले नहीं, जीवन गढ़ने वाले अध्यापक चाहिएँ
आज के विद्यार्थी को विषय-वस्तु समझाने के लिए अनेक साधन उपलब्ध हैं, लेकिन उसके व्यक्तित्व को दिशा देने वाला शिक्षक आज भी अपरिहार्य है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह विद्यार्थी के व्यक्तित्व का निर्माता है। हमें ऐसे अध्यापक चाहिए जो अपने कार्य को नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का दायित्व समझें। जिनका लक्ष्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक दिलाना न हो, बल्कि उनके पास आने वाला प्रत्येक विद्यार्थी मानसिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से विकसित होकर समाज की मुख्यधारा में प्रवेश करे। मूल विचार में भी ऐसे अध्यापकों की आवश्यकता पर बल दिया गया है जो अपने विद्यार्थियों के संपूर्ण विकास के लिए पूर्ण समर्पण के साथ कार्य करें। जिस प्रकार देश की सेना के जवान और अधिकारी कठिन प्रशिक्षण से तैयार किए जाते हैं, उसी प्रकार राष्ट्र की भावी पीढ़ी तैयार करने वाले अध्यापकों का चयन, प्रशिक्षण और संस्कार भी अत्यंत गंभीरता से होना चाहिए। अध्यापक स्वयं कर्मठ, अनुशासित, श्रद्धावान, राष्ट्रनिष्ठ और अपने विषय के पारंगत होंगे तभी वे विद्यार्थियों में इन गुणों का संचार कर पाएँगे।
विद्यार्थी में श्रम और संघर्ष का संस्कार
हमारे सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि आधुनिक जीवन ने सुविधाओं को आवश्यकता से अधिक महत्व दे दिया है। विद्यार्थी को हर सुविधा उपलब्ध कराना ही प्रेम और सफलता का प्रमाण नहीं है। जीवन में अभाव, कठिनाई और संघर्ष का सामना करने की क्षमता भी विकसित करनी होगी। विद्यार्थी को सिखाना होगा कि जो भी कार्य वह करे, पूरी मेहनत, ईमानदारी और लगन से करे। परिणाम की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का श्रेष्ठतम निर्वहन करना उसके जीवन का सिद्धांत बने। परिश्रम से जी चुराने वाला व्यक्ति परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए अपेक्षित योगदान नहीं दे सकता। इसी प्रकार युवाओं में आत्मनिर्भरता की भावना विकसित करनी होगी। सरकारी नौकरी ही सफलता का एकमात्र रास्ता है—इस मानसिकता से बाहर निकलना आवश्यक है। विद्यार्थी शिक्षा पूरी करके अपने ज्ञान और प्रतिभा के बल पर रोजगार प्राप्त करें, उद्यम स्थापित करें और दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा करें। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है।
शिक्षा में संस्कार और राष्ट्रबोध
शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य संस्कार निर्माण भी है। हमारा विद्यार्थी अपने देश, संस्कृति, इतिहास, महापुरुषों, माता-पिता और समाज के प्रति सम्मान की भावना रखे। वह सामाजिक समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो और अपने दायित्वों को समझे। हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी है जो जाति, संप्रदाय, वर्ग अथवा अन्य सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखे। मूल आलेख में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि विद्यार्थियों को सामाजिक विभाजनों के राजनीतिक स्वरूप को समझते हुए मानव धर्म और भारतीयता की भावना को प्राथमिकता देनी चाहिए। हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण पहचान यह होनी चाहिए कि हम भारतीय हैं और मानवता हमारा सर्वोच्च धर्म है। पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन मनुष्यता का सम्मान सभी के लिए समान होना चाहिए। विद्यार्थियों में यह समझ विकसित करना शिक्षा की बड़ी जिम्मेदारी है।
विविधता में एकता ही भारत की शक्ति
भारत की विशेषता उसकी विविधता है। यहाँ अनेक भाषाएँ, संस्कृतियाँ, खान-पान, वेशभूषाएँ, परंपराएँ और पूजा-पद्धतियाँ हैं। इस विविधता को विभाजन का कारण नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक शक्ति के रूप में देखना होगा। विद्यार्थियों को सह-अस्तित्व का मर्म समझाना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अलग-अलग होकर भी हम एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यही भारतीय जीवन-दृष्टि की बड़ी शक्ति है। मूल सामग्री में इसी विचार को ‘विविधता में एकता’ और सह-अस्तित्व की भावना से जोड़ा गया है। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था इस भावना को नई पीढ़ी के मन में गहराई से स्थापित कर सके तो सामाजिक सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों को बहुत मजबूती मिलेगी।
कर्मठ शिक्षक ही बनाएँगे आत्मनिर्भर भारत
आज भारत के सामने अवसर भी बड़ा है और चुनौती भी। हमारे पास विशाल युवा शक्ति है। आवश्यकता केवल इतनी है कि इस शक्ति को सही दिशा मिले। इसके लिए हमें अच्छे विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के साथ-साथ ऐसे अध्यापकों की आवश्यकता है जो अपने दायित्व को मिशन की तरह स्वीकार करें। एक कर्मठ अध्यापक विद्यार्थी को केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता; वह उसे जीवन के लिए तैयार करता है। वह उसके भीतर श्रम की प्रतिष्ठा, ईमानदारी, आत्मनिर्भरता, अनुशासन, राष्ट्रप्रेम, सह-अस्तित्व और मानवता के संस्कार विकसित करता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हम अपने युवाओं को शिक्षित, प्रशिक्षित और संस्कारित कर आत्मविश्वासी एवं आत्मनिर्भर बना सकें तो भारत को विश्व की अग्रणी आर्थिक और सामाजिक शक्ति बनने से कोई रोक नहीं सकता। हमें ऐसे युवा चाहिए जो स्वयं आगे बढ़ें, दूसरों को आगे बढ़ाएँ और राष्ट्र निर्माण में अपनी सार्थक भूमिका निभाएँ।इसलिए आज आवश्यकता केवल अधिक शिक्षकों की नहीं, कर्मठ, समर्पित और राष्ट्रनिष्ठ अध्यापकों की है। ऐसे अध्यापक जो अपने विद्यार्थियों में केवल ज्ञान नहीं, जीवन का विवेक भी भरें; केवल रोजगार की क्षमता नहीं, जिम्मेदारी का बोध भी जगाएँ; केवल सफलता की आकांक्षा नहीं, समाज के प्रति संवेदना भी पैदा करें। यदि शिक्षक बदलेंगे तो विद्यार्थी बदलेंगे, विद्यार्थी बदलेंगे तो समाज बदलेगा और समाज बदलेगा तो राष्ट्र नई ऊँचाइयों की ओर बढ़ेगा।यही सच्ची शिक्षा है और यही सच्चा राष्ट्र-निर्माण।
जय हिन्द! जय भारत!
— डॉ. अशोक कुमार गदिया
कुलपति, मेवाड़ विश्वविद्यालय
चित्तौड़गढ़, राजस्थान
