रक्षाबंधन को सामान्यतः भाई-बहन के प्रेम का पर्व कहा जाता है। बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसकी रक्षा का वचन देता है। लेकिन यदि हम इस पर्व को केवल इसी परंपरा तक सीमित कर दें तो शायद उसके व्यापक अर्थ को समझने से चूक जाएँगे। रक्षाबंधन की यात्रा बहुत लंबी है। इसका मूल रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा में दिखाई देता है, पुराणों ने इसे धार्मिक आख्यानों से जोड़ा, लोकजीवन ने इसे भाई-बहन के रिश्ते का पर्व बनाया और आधुनिक भारत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे सामाजिक एकता का प्रतीक तक बना दिया। आज जब परिवारों के भीतर संवाद कम हो रहा है, सामाजिक तनाव बढ़ रहे हैं और रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक होते जा रहे हैं, तब रक्षाबंधन की उपयोगिता पहले से कहीं अधिक दिखाई देती है। जरूरत केवल इस बात की है कि हम “रक्षा” शब्द का अर्थ समय के साथ बदलकर समझें।
रक्षा-सूत्र की प्राचीन परंपरा
रक्षाबंधन का कोई एक निश्चित ऐतिहासिक आरंभ-वर्ष बताना कठिन है। इसकी जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा के रक्षा-सूत्र में मिलती हैं। वैदिक और उत्तरवैदिक परंपराओं में अनिष्ट से बचाने और मंगलकामना के लिए पवित्र सूत्र बाँधने की परंपरा रही है। बाद के ग्रंथों में श्रावण पूर्णिमा को रक्षा-सूत्र बाँधने की परंपरा के उल्लेख मिलते हैं। भविष्य पुराण से जुड़ी प्रसिद्ध कथा में देवासुर संग्राम के समय इंद्राणी द्वारा इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधने का उल्लेख आता है। यहाँ राखी भाई-बहन के संबंध का प्रतीक नहीं, बल्कि संकट से रक्षा और विजय की कामना का प्रतीक है। यही बात रक्षाबंधन के मूल अर्थ की ओर संकेत करती है। रक्षा का अर्थ प्रारंभ से ही केवल किसी एक व्यक्ति की रक्षा करना नहीं था, यह कल्याण और सुरक्षा की व्यापक कामना थी।
कृष्ण-द्रौपदी से लेकर लोकजीवन तक
कृष्ण और द्रौपदी की कथा रक्षाबंधन के साथ सबसे लोकप्रिय रूप से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार कृष्ण की उँगली से रक्त निकलने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़कर उनकी उँगली पर बाँध दिया। कृष्ण ने इस स्नेह को स्वीकार किया और द्रौपदी के प्रति संरक्षण का भाव रखा। ऐतिहासिक दृष्टि से इसे आधुनिक रक्षाबंधन की शुरुआत का प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन भारतीय लोकमानस ने इस कथा में राखी के भाव को पहचान लिया यानी संकट में साथ खड़े होना। लक्ष्मी-बलि और यम-यमुना जैसी कथाएँ भी इस पर्व के अर्थ को अलग-अलग रूपों में सामने लाती हैं। इन कथाओं की ऐतिहासिकता से अलग उनका सांस्कृतिक संदेश स्पष्ट है यानी रिश्ते केवल नाम के नहीं होते, उनमें दायित्व भी जुड़े होते हैं।
भाई-बहन का पर्व कैसे बना
समय के साथ रक्षा-सूत्र की व्यापक परंपरा का एक महत्वपूर्ण रूप भाई-बहन के संबंध से जुड़ गया। विशेष रूप से उत्तर भारतीय सामाजिक जीवन में विवाह के बाद बहन का मायके से संबंध बनाए रखने में भाई की महत्वपूर्ण भूमिका रही। वर्ष में एक बार बहन का मायके आना, भाई की कलाई पर राखी बाँधना और दोनों का एक-दूसरे के प्रति दायित्व दोहराना सामाजिक संबंधों को मजबूत करता था। इस दृष्टि से राखी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी। वह परिवार की स्मृति और संबंधों की पुनर्पुष्टि का अवसर भी थी। लेकिन आज इस परंपरा को एक नए अर्थ की आवश्यकता है। यदि हम अब भी यह मानें कि केवल भाई ही रक्षक है और बहन केवल संरक्षण पाने वाली है, तो हम आधुनिक सामाजिक वास्तविकता से पीछे रह जाएँगे। आज बहन भी भाई की उतनी ही बड़ी ताकत बन सकती है। इसलिए आधुनिक राखी का संदेश होना चाहिए-“हम एक-दूसरे की रक्षा और सहायता करेंगे।”
कर्णावती और हुमायूँ की कहानी
रक्षाबंधन के साथ रानी कर्णावती और हुमायूँ की कहानी भी लोकप्रिय है। कहा जाता है कि मेवाड़ पर संकट के समय कर्णावती ने हुमायूँ को राखी भेजकर सहायता माँगी थी। हालांकि इतिहासकार इस कथा के विवरण और प्रमाणों को लेकर सावधानी बरतते हैं, इसलिए इसे निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य कहना उचित नहीं होगा। फिर भी इस कथा का सांस्कृतिक महत्व है। यह बताती है कि राखी की कल्पना रक्त संबंधों से आगे जाकर विश्वास और संरक्षण के रिश्ते के रूप में भी की गई।
जब ठाकुर ने राखी को बना दिया एकता का प्रतीक
रक्षाबंधन का आधुनिक इतिहास 1905 में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेता है। ब्रिटिश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया। इस विभाजन के विरोध में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने राखी को हिंदू-मुस्लिम एकता और बंगाल की अखंडता का प्रतीक बनाया। उन्होंने लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधने का आह्वान किया। इस तरह राखी का अर्थ परिवार से निकलकर समाज तक पहुँच गया। एक हिंदू दूसरे मुसलमान की कलाई पर राखी बाँध सकता था और दोनों यह कह सकते थे कि हम एक-दूसरे के साथ हैं। यह प्रसंग आज विशेष रूप से प्रासंगिक है। जब धर्म, जाति, भाषा और राजनीतिक विचारों के आधार पर समाज में दूरी पैदा होती दिखाई देती है, तब ठाकुर का संदेश हमें याद दिलाता है कि रक्षा केवल व्यक्ति की नहीं, सामाजिक सद्भाव की भी करनी होती है।
भारत में हर जगह एक जैसी राखी क्यों नहीं?
भारत की विविधता के कारण श्रावण पूर्णिमा का स्वरूप भी हर क्षेत्र में समान नहीं रहा। महाराष्ट्र और कोंकण के तटीय क्षेत्रों में नारली पूर्णिमा प्रमुख है। मछुआरा समुदाय समुद्र और वरुण की पूजा करता है तथा नारियल अर्पित करता है। दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में इसी समय अवनि अवित्तम या उपाकर्म की परंपरा प्रमुख है, जिसमें यज्ञोपवीत परिवर्तन और वैदिक अध्ययन से जुड़े संस्कार होते हैं। ओडिशा में गम्हा पूर्णिमा का अपना सांस्कृतिक महत्व है, जिसका संबंध स्थानीय धार्मिक, कृषि और पशुधन परंपराओं से है। पश्चिम बंगाल में इसी समय झूलन पूर्णिमा की वैष्णव परंपरा भी महत्वपूर्ण रही है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि इन क्षेत्रों में रक्षाबंधन “मनाया ही नहीं जाता।” अधिक सटीक बात यह है कि एक ही तिथि को अलग-अलग क्षेत्रों में अलग सांस्कृतिक परंपराएँ प्रमुख रही हैं।
आज के संदर्भ में रक्षा का अर्थ
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आज रक्षाबंधन की उपयोगिता क्या है? आज महिला को केवल पुरुष की शारीरिक सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। उसे सम्मान, समान अवसर, स्वतंत्र निर्णय, शिक्षा और सुरक्षित सामाजिक वातावरण चाहिए। इसी तरह पुरुष भी भावनात्मक सुरक्षा, पारिवारिक सहयोग और विश्वास चाहता है। इसलिए आज राखी का अर्थ होना चाहिए-सुरक्षा नहीं, पारस्परिक सहारा। भाई बहन के साथ खड़ा हो और बहन भाई के साथ। एक-दूसरे की कठिनाइयों को समझना, बीमारी या आर्थिक संकट में साथ देना, अकेलेपन में बातचीत करना और जीवन के निर्णयों में सम्मान देना, यही आज की वास्तविक रक्षा है।
परिवार में संवाद का पर्व
आज परिवार एक छत के नीचे रहते हुए भी कई बार एक-दूसरे से दूर हैं। मोबाइल, सामाजिक माध्यम और व्यस्त जीवन ने संवाद का स्थान कम कर दिया है। ऐसे समय में रक्षाबंधन परिवार को फिर से एक साथ बैठने का बहाना देता है। जरूरी नहीं कि राखी के साथ महँगा उपहार दिया जाए। कभी-कभी एक घंटा साथ बैठना, पुराने दिनों को याद करना और यह पूछ लेना कि “तुम सचमुच ठीक हो?” किसी भी महँगे उपहार से अधिक मूल्यवान हो सकता है।
रक्षा केवल बहन की नहीं
आज हमें यह भी समझना होगा कि समाज में अनेक लोग भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत महसूस करते हैं। बुजुर्ग, अकेले रहने वाले लोग, आर्थिक कठिनाइयों से गुजरते परिवार, बच्चे और वे लोग जो किसी कारण से समाज के हाशिए पर हैं। यदि रक्षाबंधन हमें किसी कमजोर व्यक्ति के साथ खड़े होने की प्रेरणा देता है तो यह पर्व अपने मूल अर्थ के और निकट पहुँचता है। रक्षाबंधन की हजारों वर्षों की यात्रा में इसका अर्थ लगातार विस्तृत हुआ है। प्राचीन रक्षा-सूत्र से शुरू होकर यह पुराणिक कथाओं, लोकजीवन, भाई-बहन के संबंध और फिर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के माध्यम से सामाजिक एकता तक पहुँचा। रक्षा का अर्थ अब केवल यह नहीं कि भाई बहन की रक्षा करेगा। रक्षा का अर्थ यह है कि मनुष्य मनुष्य के साथ खड़ा होगा। रिश्तों की रक्षा होगी। सम्मान की रक्षा होगी। स्त्री की गरिमा की रक्षा होगी। बुजुर्गों की उपेक्षा से रक्षा होगी। बच्चों के भविष्य की रक्षा होगी। समाज में सद्भाव की रक्षा होगी और सबसे बढ़कर मानवीय संवेदना की रक्षा होगी। राखी का धागा बहुत पतला होता है, लेकिन वह हमें एक बहुत मजबूत बात याद दिलाता है कि रिश्ते खून से बन सकते हैं, पर विश्वास और जिम्मेदारी से टिकते हैं। इसलिए इस रक्षाबंधन पर यदि भाई बहन की कलाई पर राखी बाँधते हुए केवल इतना कह दे-“जब भी जरूरत होगी, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा” और बहन भी यही वचन भाई को दे दे, तो शायद सदियों पुरानी इस परंपरा को आज के समय का सबसे सुंदर अर्थ मिल जाए। क्योंकि वास्तविक रक्षा कलाई पर बँधे धागे से नहीं, मुश्किल समय में थामे गए हाथ से होती है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
