भारत केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामरिक दृष्टि से भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्र है। हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक फैला भारत सदियों से अपनी सीमाओं की रक्षा करता आया है। किंतु स्वतंत्रता के बाद से भारत को अपनी सीमाओं पर अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आज भी भारत की हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि पर चीन और पाकिस्तान का अवैध कब्जा बना हुआ है। यह केवल भूभाग का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता, सुरक्षा और संप्रभुता का विषय है।
भारत सरकार के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार चीन ने लगभग 38 हजार वर्ग किलोमीटर भारतीय भूमि पर कब्जा कर रखा है, जिसे अक्साई चिन कहा जाता है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान ने 1963 में लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र शक्सगाम घाटी चीन को सौंप दिया था, जिसे भारत अवैध मानता है। दूसरी ओर पाकिस्तान के कब्जे में लगभग 78 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र है, जिसे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर अर्थात् पीओके कहा जाता है। भारत स्पष्ट रूप से मानता है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है।
भारत-चीन सीमा विवाद का इतिहास 1962 के युद्ध से जुड़ा हुआ है। उस युद्ध के बाद चीन ने अक्साई चिन पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। वहीं पाकिस्तान ने 1947-48 के युद्ध के दौरान जम्मू-कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया, जो आज भी पीओके के रूप में जाना जाता है। समय बीतने के साथ इन विवादों ने केवल सीमा विवाद का स्वरूप नहीं रखा, बल्कि दक्षिण एशिया की राजनीति और सुरक्षा व्यवस्था को भी प्रभावित किया।
भारत सरकार इन क्षेत्रों को वापस पाने और सीमाओं की सुरक्षा के लिए निरंतर बहुआयामी प्रयास करती रही है। सबसे पहले भारत ने कूटनीतिक स्तर पर विश्व समुदाय के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखा। संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि अक्साई चिन और पीओके भारत का हिस्सा हैं। भारत ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपीईसी का भी विरोध किया, क्योंकि यह परियोजना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरती है। भारत का तर्क है कि किसी भी विवादित भारतीय क्षेत्र में बिना भारत की अनुमति के निर्माण कार्य अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सैन्य दृष्टि से भी अपनी स्थिति अत्यंत मजबूत की है। लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश और अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों, सुरंगों और एयरबेस का निर्माण तेजी से किया गया है। भारतीय सेना को आधुनिक हथियारों से सुसज्जित किया गया है। राफेल लड़ाकू विमान, एयर डिफेंस सिस्टम, ब्रह्मोस मिसाइल और अत्याधुनिक ड्रोन तकनीक ने भारतीय रक्षा क्षमता को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारतीय नौसेना की बढ़ती शक्ति भी चीन के विस्तारवादी रवैये के लिए एक बड़ा संदेश मानी जा रही है।
वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना भी भारत की एक बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक पहल मानी गई। इस निर्णय ने दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को लेकर किसी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश बनाकर भारत ने प्रशासनिक और सामरिक दृष्टि से अपनी पकड़ और मजबूत की।
सीमा क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे का विकास भी भारत की प्राथमिकता बन चुका है। बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन द्वारा सीमावर्ती इलाकों में तेजी से सड़कें और पुल बनाए जा रहे हैं। इससे सेना की तैनाती और आपूर्ति व्यवस्था अधिक मजबूत हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने तिब्बत क्षेत्र में जिस प्रकार का इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित किया है, उसके मुकाबले भारत अब तेजी से अपनी क्षमता बढ़ा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और आर्थिक शक्ति से भी लड़े जाते हैं। अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञ जॉन स्पेंसर ने हाल ही में कहा कि भारत का एकीकृत रक्षा नेटवर्क और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम क्षेत्रीय संतुलन को बदल रहे हैं। वहीं भारतीय सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी स्पष्ट किया है कि सीमा पार आतंकवाद और घुसपैठ के खिलाफ भारत अब पहले से अधिक आक्रामक और सक्षम नीति अपना रहा है।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि चीन के साथ सीधा युद्ध आसान नहीं होगा, क्योंकि दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं। यही कारण है कि भारत वर्तमान में प्रत्यक्ष युद्ध के बजाय सामरिक दबाव, आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय समर्थन की नीति पर अधिक बल दे रहा है। पाकिस्तान के संदर्भ में भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक और सीमित जवाबी कार्रवाई जैसी रणनीतियों के माध्यम से यह संकेत दिया है कि आतंकवाद को अब बिना जवाब के नहीं छोड़ा जाएगा।
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में भारत को कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर और अधिक ध्यान देना होगा। सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास और जनसंख्या बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि वे क्षेत्र रणनीतिक रूप से और मजबूत बन सकें। रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता भी समय की मांग है। “मेक इन इंडिया” और स्वदेशी हथियार निर्माण को बढ़ावा देकर भारत अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी देशों पर निर्भरता कम कर सकता है। इसके साथ ही क्यूयूएडी जैसे अंतरराष्ट्रीय समूहों के साथ सामरिक साझेदारी को मजबूत करना भी आवश्यक माना जा रहा है।
आज भारत जिस प्रकार आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, उससे यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए और अधिक सक्षम होगा। सीमा विवाद केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, आर्थिक मजबूती और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से भी सुलझाए जाते हैं। भारत ने पिछले वर्षों में इन सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है।
निस्संदेह भारत की अवैध कब्जे वाली भूमि का मुद्दा देश की संवेदनशील राष्ट्रीय चिंताओं में से एक है। हर भारतीय की भावना इससे जुड़ी हुई है। देश की जनता चाहती है कि भारत अपनी खोई हुई भूमि वापस प्राप्त करे और उसकी सीमाएँ पूरी तरह सुरक्षित रहें। वर्तमान परिस्थितियों में भारत जिस संयम, शक्ति और रणनीति के साथ आगे बढ़ रहा है, वह यह संकेत देता है कि देश अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
लेखक
डाॅ. चेतन आनंद
(कवि एवं पत्रकार)
