माना कि लालकिले पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस तिरंगा नहीं फहरा सके, लेकिन देश को आजादी दिलाने में उनका योगदान अविस्मरणीय और अतुलनीय है। देखा जाये तो नेताजी नहीं होते तो देश कभी आज़ाद नहीं हो सकता था। नेताजी सुभाष ही एक ऐसे व्यक्ति थे जो देश के लिए जिये और देश के लिए ही मरे। वह रियल हीरो थे। महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविन्द सिंह और बाल गंगाधर तिलक का प्रतिबिम्ब थे नेताजी सुभाष। कांग्रेस का अध्यक्ष बनने से लेकर आज़ाद हिन्द फौज बनाकर देश के लिए मर-मिटने का जज़्बा रखने वाले सुभाषचंद्र बोस अपने आपमें इकलौते और विरले नेता थे। सभी लोग एक बार उनकी जीवनी ज़रूर पढ़ें। जो शिक्षक हैं वो भी और जो बनने वाले हैं, वो भी। उनकी जीवनी पढ़ने में मात्र 20 मिनट लगेंगे। लेकिन ये 20 मिनट आपकी पूरी जिऩ्दगी बदल देंगे, ऐसा मुझे विश्वास है।
नेताजी अपने माता-पिता की नौवीं संतान थे। पिता वकील थे। मां धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। सुभाषचंद्र बोस बड़े मेधावी छात्र थे। दसवीं कक्षा में एक शिक्षक ने कक्षा में भारतदेश की शान में विपरीत टिप्पणी कर दी। सुभाष से सहन नहीं हुआ और उन्होंने आवेश में शिक्षक को थप्पड़ जड़ दिया और स्कूल छोड़कर घर आ गये। कोलकाता में पढ़े। वहां उन्होंने पूरे बंगाल में प्रथम श्रेणी प्राप्त कर सबको चौंका दिया। साइकोलॉजी में स्नातक करने के बाद सुभाष विलायत आगे की पढ़ाई करने चले गये। सुभाष जी को स्वामी विवेकानंद प्रिय थे। वह हमेशा उन्हें पढ़ते रहते थे। उनके विचारों से वह बहुत प्रभावित थे। देश के हालात से वे ज़्यादा खुश नहीं थे। इसलिए अपनी मां व भाई को उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी बनने की अपनी इच्छा जताई। लेकिन पिता व परिवार के दबाव में वह इंग्लैंड गये। वहां से उन्होंने उस समय की सर्वोच्च व सम्मानजनक आईसीएस की परीक्षा उत्तीर्ण की। उस वक़्त आईसीएस होना बड़ा गौरवशाली माना जाता था। आईसीएस बनना मतलब ब्रिटिश सरकार में लाट साहब बनने जैसा होता था। उन्होंने पूरे देश में आईसीएस की परीक्षा में चौथा स्थान पाया। लेकिन परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद उन्होंने नौकरी नहीं की। वह सीधा महात्मा गांधी के पास आ गये। बंगाल में उन्होंने चितरंजनदास मुंशी के साथ काम करना शुरू किया। वह आगे चलकर यूथ कांग्रेस के बड़े नता बने। उनके प्रखर व्यक्तित्व से प्रभावित होकर उन्हें जल्द ही कांग्रेसाध्यक्ष बना दिया गया। वे कांग्रेस में 38वें व 39वें अध्यक्ष बने। हालांकि कांग्रेसाध्यक्ष बनाने का महात्मा गांधी ने घोर विरोध किया। नेताजी के खि़लाफ उन्होंने जमकर प्रचार भी किया। उन्होंने अंदरखाने कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए खड़े हुए दूसरे प्रतिद्वंद्वी सीता बी. पट्टारमैया का समर्थन किया। बावजूद इसके नेताजी अपने बलबूते जीते और भारी भरकम वोटों से जीते। कांग्रेसाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बिगुल फूंक दिया। उसे छह महीने में देश छोड़ने का अल्टीमेटम दे डाला। नेताजी की इस बात को अन्य कांग्रेसी पचा नहीं पाये। नाराज़ नेताजी ने अपनी अलग फॉरवर्ड पार्टी बना ली। नेताजी की क्रांतिकारी गतिविधियों को अंग्रेजों ने विरोधी करार दिया और उन्हें बर्मा जेल में डाल दिया। नेताजी वहां बीमार हो गये। उन्हें टीबी हो गई। लेकिन नेताजी ने हार नहीं मानी। कहते हैं कि अधिकार छीनकर लिये जाते हैं। इसलिए नेताजी भी अपने अधिकार अंग्रेजी हुकूमत से छीनकर लेना चाहते थे। इसीलिए उन्होंने बीमारी के बावजूद अपनी रिहाई की कहीं कोई याचना नहीं की। उन्होंने बीमार रहते हुए जेल में दाढ़ी बढ़ाई, हुलिया बदला और पठान का वेश धारण कर कोलकाता से बाहर निकल गये। काबुल पहुंचे मगर पखतून भाषा बोलना नहीं जानते थे। इसलिए वहां गूंगे-बहरे बने रहे। रूस पहुंचे। वहां से इटली फिर जर्मनी चले गये। मुसोलिनो और हिटलर से भेंट की। भारत की आज़ादी के बाबत उनसे बातचीत की। वहां अंग्रेजी हुकूमत के ख़िलाफ रणनीति बनाई। एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किया। जर्मन की फौज में तीन हज़ार सैनिक भारतीय थे। उनसे वार्ता की। वहां से बर्लिन की फौज को सम्बोधित किया। द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ चुका था। ग्रेट ब्रिटेन जल रहा था। ब्रिटिश हुकूमत को परास्त करने का अच्छा मौका था। लेकिन परिस्थितियां विपरीत थीं। ऐसे में हिटलर नेताजी का साथ न दे सके। वह जर्मनी छोड़कर जापान आ गये। जापान सरकार ने नेताजी का साथ दिया। वहां नेताजी ने आज़ाद हिन्द फौज गठित की। रास बिहारी बोस के निमंत्रण पर उन्होंने अनेक देशों की यात्राएं कीं। ग्रेट ब्रिटेन के ख़िलाफ 85 हज़ार सैनिक आज़ाद हिन्द फौज में तैयार किये। उन्हें नेताजी ने हथियार दिये। उन्हें समुचित प्रशिक्षण दिया। पहली बार फौज में महिला बटालियन बनाई गई। पूर्वी एशिया में 30 लाख लोगों से नेताजी ने सम्पर्क साधा। उनसे बातचीत कर भारत के हालात बताये। अपनी योजना बताई। प्रभावित होकर लोगों ने सहायतार्थ उन्हें पैसा दिया। महिलाओं ने अपने गहने तक दे डाले। आज़ाद हिन्द फौज के पास इस तरह काफी फंड एकत्र हुआ। सिंगापुर व बर्मा में नेताजी द्वारा दिया गया भाषण सुनने लायक है। तेज़ बारिश के बावजूद लोग भारी संख्या में उनका भाषण सुनते रहे। लेकिन अपनी जगह से नहीं हिले। बारिश बंद होने के बाद तक भी नेताजी का भाषण अविरल चलता रहा। नेताजी के शब्दों में जादू था। उनका व्यक्तित्व आकर्षक था। वे अपनी बातों से सबको सम्मोहित कर लेते। रंगून रेडियो पर उनका भाषण ज़बरदस्त रहा। उनका यह कहना कि सावधान, तैयार रहो, मैं आ रहा हूं। ‘मैं सुभाष बोल्ची’ शब्द सुनकर लोग चौकन्ने हो उठे। सुभाष ने कहा कि देश का अभी विभाजन मत करो। मैं आ रहा हूं। उन्होंने इस दौरान आज़ाद हिन्द फौज की मदद से अंडमान-निकोबार पर हमला बोला। वहां तिरंगा लहराया। अपना हैड क्वार्टर बना डाला। कोहिमा व इम्फाल में उनकी फौज ने ज़बरदस्त युद्ध किया। आज भी इम्फाल व कोहिमा में स्मारक लगे हुए हैं। उन्हें पढ़ें। पूरे युद्ध और उसमें मरने वाले शहीदों का वर्णन मिलता है। वाटर लू से भी अधिक भयावह व बड़ा युद्ध कोहिमा का था। ब्रिटिश इतिहास में साफ लिखा है कि हमने अपने सैनिक आज़ाद हिन्द फौज से लड़ने में अधिक गंवाये हैं। आक्रोश में अमेरीका ने हिरोशिमा-नागासाकी पर भयंकर बम वर्षा की। वहीं से नेताजी को पीछे हटना पड़ा। काफी तादात में लोग मारे गये। इनमें भी हिन्दुस्तानी ज़्यादा मारे गये। कारण, ब्रिटिश सेना में भी भारतीय सैनिक शामिल थे। उधर, ब्रिटिश फौज में शामिल भारतीय सैनिक आत्मग्लानि से भर उठे। उन्हें लगा कि वे यह युद्ध क्यों और किसके लिये लड़ रहे हैं। वे तो अपने ही भारतीय सैनिकों को मौत के घाट उतार रहे हैं। यही आत्मग्लानि हमारी आज़ादी का कारण बनी। अंग्रेज तो वर्ष 1942 में ही परास्त हो चुके थे। देश को आज़ादी तो मिल ही चुकी थी। बस, औपचारिक घोषणा होनी बाकी थी। अंग्रेज देश छोड़ने को तैयार थे। मगर सार्वजनिक तौर पर अपनी हार स्वीकारना नहीं चाहते थे। सही मायनों में वर्ष 1942 से लेकर 1947 तक का कालखंड आज़ाद हिन्द फौज का रहा। लालकिले में भारतीयों की एक आपात बैठक हुई। वकील भोलानाथ देसाई ने मुकदमा लड़ा। युद्ध में बंदी बनाये गये भारतीयों को रिहा कराया। उधर, अंग्रेज मान चुके थे कि अगर इंग्लैंड बचाना है तो भारत छोड़ना होगा। ऐसे में अंग्रेजों ने सत्ता लोलुपों के आगे चुग्गा डाल दिया। सत्ता लोलुपों ने अंग्रेजों से समझौता कर लिया। मुल्क के दो टुकड़े हो गये। अंग्रेजों की चाल काम आई। आज भारत व पाकिस्तान अंग्रेजों की ही देन है। जाते-जाते उन्होंने भारत के दो टुकड़े करवा दिये। अंग्रेजों की इसी चाल का नतीजा आज हम भुगत रहे हैं। दिल्ली में ब्रिटिश हुकूमत को भारत छोड़ने पर मजबूर किया आज़ाद हिन्द फौज ने, मगर आज़ाद भारत की सत्ता पर कुछ स्वार्थी लोग काबिज हो गये। नेताजी का योगदान अतुलनीय है। भले ही वह लालकिले पर तिरंगा नहीं फहरा सके लेकिन आज़ादी तो नेताजी के प्रयासों से ही हमें हासिल हुई। देश ऐसे ही नहीं बना करते। मुल्क बनाने के लिए कुर्बानियां देनी पड़ती हैं। देश के लिए जीना-मरना पड़ता है। परमहंस रामकृष्ण ने उस अवस्था में विवेकानंद को जन्म दिया, जब लोग आराम करने की उम्र में आ जाते हैं। विवेकानंद को पढ़कर सुभाष जैसा क्रांतिकारी जन्मा।
अगर हमारे शिक्षक यह ठान लें कि उन्हें साल में एक छात्र देशभक्त बनाना है तो देश देखना प्रगति के पंख लगाकर कहां से कहां पहुंच जाएगा। विद्यार्थियों को काबिल बनाओ। उनमें देशभक्ति व संवेदनशीलता का भाव जगाओ। मुझे पक्का विश्वास है कि हम जरूर सफल होंगे। तेज़ रोशनी आने से पहले घना अंधेरा छाया रहता है। आज हमारा देश भी इसी घने अंधेरे की चपेट में है। हमारा इतिहास गवाह है कि जब-जब भी हमारा देश घने अंधकार से घिरा तो महापुरुष पैदा हुए। आज भी देश घने अंधकार में है। हमें आज वैसा ही मनोबल बनाना होगा। देखना फिर हममें से कोई महापुरुष बनकर देश को तरक्की की नई राह पर ले जाएगा।
जय हिन्द
डॉ. अशोक कुमार गदिया
(लेखक मेवाड़ विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं।)
