-संतोष श्रीवास्तव
अंतररष्ट्रीय विश्वमैत्री मंच द्वारा, दिनाँक - 10 अक्टूबर 2026, शनिवार, शाम 5:00 बजे गूगल मीट पर कहानी संवाद का कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस अवसर पर कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ साहित्यकार संतोष श्रीवास्तव ने कहा कि-
“साहित्य की प्रत्येक विधा में कहानी है। बिना कहानी के लेखन संभव नहीं है। वर्णन और घटनाओं को यदि सीमित किया जाय तो कहानी प्रभावी बन जाती है। साहित्य की दृश्यता भी अभूतपूर्व है। यही कारण है कि सोशल मीडिया का अपना ही सौंदर्य शास्त्र है। जहाँ कहानी पढ़ी और उसका नाटकीय मंचन बहुत ही खुबसूरत अंदाज़ में देखा जा सकता है।”
मुख्य अतिथि मीनाक्षी दुबे ने मीनधर पाठक की कहानी का विश्लेषण करते हुए कहा कि -
“मीनाधर पाठक की कहानी ‘रेत के घरौंदे’ का कथानक निर्मल वर्मा की कहानियों की याद दिलाता है। जहाँ वर्तमान की एक छोटी-सी खिड़की अतीत के दरवाज़े खोलती है। इनकी कहानी में भी अतीत पानी की लहरों पर चलकर आता है और इन्हीं से अपनी कहानी सुनाकर ख़त्म भी करता है। कहानी में दिये गए विवरण एक सुन्दर चित्र की रचना करते हैं और वह चित्र पाठक को दिखाई भी देता है। लेकिन कहानी जिन सवालों को खड़ा करती है उन्हें आगे नहीं बढ़ा पाती। ये बात बिल्कुल सच है कि सागर कभी नदी नहीं बन पाता जबकि नदी सागर बन जाती है।”
विशिष्ट अतिथि रानी सुमिता ने कहा कि -
“डॉक्टर सबीहा रहमानी की कहानी ‘भटकन’ एक भाव प्रधान कहानी है। इस कहानी में अनेक सुन्दर बिम्ब हैं। दिसम्बर के महीने का रूपक बहुत सुन्दर है। यह कथाकार के वैचारिक स्तर का प्रतिबिम्ब भी है। ये बात सच है कि ख़ुश्क और शुष्क रंगों से जीवन अछूता नहीं। कभी-कभी यही रंग जीवन को खूबसूरत भी बनाते हैं। इनकी कहानी में इंतज़ार जीवन की एक ऐसी धुरी बनकर आता है जिसके इर्द - गिर्द कहानी घूमती रहती है। एक खास बात इस कहानी की ये है कि कहानी अपनी कथा तो कहती ही है लेकिन जीवन की सच्चाई भी बयान करती है।”
जहाँ जया केतकी शर्मा ने सभी अतिथियों का भावभीना स्वागत किया तो वहीं आभा दवे ने आत्मीय आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन मुज़फ़्फ़र सिद्दीक़ी ने किया।
इस अवसर पर अनेक साहित्यकार और पत्रकार अंत तक मौजूद रहे। कहानीकार मृदुला मिश्रा ने अपनी टिप्पणी में कहा कि कहानियों में वर्णन अधिक था। इसे कम किया जा सकता था।
वरिष्ठ उपन्यासकार राज बोहरे जी ने विशेष टिप्पणी में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि -
“कहानियाँ कुछ ज़्यादा ही लम्बी थीं। दरअसल हर एक कहानी के दो-तीन ड्राफ्ट तैयार किये जाने चाहिए। उन ड्राफ्टों का विभिन्न मंचों के अनुसार चयन किया जाना चाहिए। यदि किसी पत्रिका में भेजना है तो उसका मूल ड्राफ्ट भेजने में कोई हर्ज नहीं लेकिन यदि उस कहानी को पढ़कर सुनानी है तो उसकी समय सीमा के अनुसार ड्राफ्ट तैयार करना चाहिए ताकि श्रोता बोर न हो।”
कहानी संवाद का यह कार्यक्रम अंत में कहानी लेखन कौशल की एक कार्यशाला में तब्दील हो गया।
----
प्रस्तुत कर्ता - मुज़फ़्फ़र सिद्दीक़ी

