भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ हर नागरिक का वोट देश की दिशा तय करता है। ऐसे में मतदान प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है मतदाता सूची। यदि मतदाता सूची सटीक और अद्यतन हो, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता और शक्ति दोनों बढ़ती हैं। लेकिन यदि सूची में त्रुटियाँ हों, नाम गायब हों, पता गलत हो, मृत व्यक्तियों के नाम बने रहें, तो चुनाव की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। यही कारण है कि चुनाव आयोग ने हाल के वर्षों में मतदाता सूची सुधार नीति को एक प्रमुख सुधार के रूप में लागू किया है। यह नीति न केवल पारदर्शिता बढ़ाती है, बल्कि मतदाता को सशक्त भी बनाती है।
मतदाता सूची सुधार की आवश्यकता क्यों पड़ी-भारत की जनसंख्या विशाल है और लगातार स्थानांतरित होने वाली भी। लाखों लोग रोजगार, शिक्षा या विवाह के कारण हर साल अपना पता बदलते हैं। इन बदलावों के बीच अक्सर मतदाताओं का नाम गलत क्षेत्र में रह जाता है या बिल्कुल हट जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है, जहाँ डिजिटल जागरूकता कम होने के कारण सुधार प्रक्रिया तक लोगों की पहुँच भी सीमित है। 2019 में कई राज्यों में हजारों मतदाताओं के अचानक नाम गायब मिलने के मामले सामने आए, जिसके बाद चुनाव आयोग पर यह दबाव बढ़ा कि मतदाता सूची को डिजिटल, पारदर्शी, सटीक और सार्वजनिक नियंत्रित बनाया जाए। इसी आवश्यकता से जन्म हुई मतदाता सूची सुधार नीति की।
क्या है मतदाता सूची सुधार नीति
इस नीति के तहत चुनाव आयोग ने ऐसी व्यवस्थाएँ लागू की हैं जो मतदाता पंजीकरण को सरल, सुरक्षित और पारदर्शी बनाती हैं। इसके मुख्य प्रावधान निम्न हैं-
1.ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण और संशोधन-अब नागरिक अपना नाम जोड़ना, हटाना, पता बदलना या सुधार करना घर बैठे ऑनलाइन कर सकते हैं।
2.एआई आधारित डुप्लीकेट एंट्री हटाना-डुप्लीकेट वोटर आईडील और फर्जी प्रविष्टियों को हटाने के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग।
3.मतदाता सूची का वार्षिक नहीं, बल्कि ‘चार बार संशोधन’-पहले साल में केवल एक बार संशोधन होता था, अब वर्ष में चार बार अवसर मिलता है।
4.पता और पहचान-ऑनलाइन दस्तावेजों से अब सत्यापन के लिए फिज़िकल दौड़ कम हो गई है।
5.बीएलओ को डिजिटल उपकरण (टैबलेट/ऐप)-घर-घर जाकर डेटा अपडेट करने का काम तेजी से और सटीक होता है।
6.ईपीआईसी को आधार से जोड़ने का विकल्प (स्वैच्छिक)-इससे फर्जी पहचान और डुप्लीकेट नाम रोकने में मदद मिलती है।
भारत के मतदाताओं पर इसका प्रभाव
1.मतदान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी हुई-फर्जी मतदान और डुप्लीकेट नाम हटने से चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ी है। आज लोग मतदान के दौरान अधिक आत्मविश्वास महसूस करते हैं कि उनका वोट सुरक्षित है।
2.नए युवाओं का नाम आसानी से जुड़ रहा है-डिजिटल प्रक्रिया ने 18 प्लस युवाओं को सबसे अधिक लाभ दिया है। पहले सप्ताहों तक फॉर्म भरने और बीएलओ के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब मोबाइल फोन ही पर्याप्त है।
3.प्रवासी और किराएदार मतदाताओं को राहत-जो लोग नौकरी या पढ़ाई के कारण दूसरे शहरों में रहते हैं, वे अब आसानी से अपने नए पते पर वोट ट्रांसफर कर सकते हैं।
4.मतदान प्रतिशत में सुधार-नाम सही जगह दर्ज होने और बूथ तक सरल पहुँच के कारण वास्तविक मतदाता चुनाव में अधिक संख्या में भाग ले रहे हैं।
5.गलतियों में कमी-जैसे, नाम की स्पेलिंग, आयु, पता, क्षेत्र, बूथ संख्या, ये त्रुटियाँ पहले आम थीं। अब डिजिटल वेरिफिकेशन से इनमें भारी कमी आई है।
कहाँ-कहाँ लागू हुई है यह नीति-यह सुधार नीति पूरे भारत में लागू है। हालाँकि कुछ विशेष प्रोजेक्ट कुछ राज्यों में पहले शुरू हुए जैसे दिल्ली, केरल, कर्नाटक, घर-घर सत्यापन का उन्नत मॉडल। तेलंगाना, गुजरात, महाराष्ट्र, डुप्लीकेट हटाने के लिए एआई आधारित पायलट, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बीएलओ मोबाइल ऐप का व्यापक उपयोग, अब यह मॉडल चुनाव आयोग की केंद्रीय गाइडलाइन के साथ सभी राज्यों में लागू है।
फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं
1.डिजिटल पहुंच की असमानता-ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता सीमित है। इससे कई लोग ऑनलाइन सुधार प्रक्रिया का उपयोग नहीं कर पाते।
2.प्रवासी कामगारों की बड़ी संख्या-भारत के लगभग 30 करोड़ आंतरिक प्रवासी हैं। हर बार पता बदलने पर उनकी प्रविष्टि अपडेट करना एक बड़ी चुनौती है।
3.बीएलओ पर अत्यधिक कार्यभार-देशभर में लाखों बहएलओ ही फील्ड में पूरा काम संभालते हैं। संसाधन और स्टाफ की कमी के कारण कई जगह त्रुटियाँ रह जाती हैं।
4.राजनीतिक दबाव और स्थानीय हस्तक्षेप-कुछ क्षेत्रों में मतदाता सूची के सुधार पर राजनीतिक दबाव भी देखने को मिलता है।
5.डुप्लीकेट हटाने में तकनीकी त्रुटियाँ-एआई प्रणाली कभी-कभी सही मतदाताओं के नाम भी गलती से डुप्लीकेट समझकर हटा देती है।
समाधान क्या होना चाहिए
1.डिजिटल जागरूकता अभियान-गांव-गांव जाकर मतदाता सूची से नाम जोड़ने या सुधारने की प्रक्रिया के बारे में लोगों को जानकारी देना।
2.बीएलओ को अधिक संसाधन और तकनीकी समर्थन-टैबलेट, एआई आधारित ऐप, और स्टाफ बढ़ाने से त्रुटियाँ कम होंगी।
3.रिमोट वोटिंग सिस्टम लागू करना-प्रवासी कामगारों के लिए चुनाव आयोग आरवीएम मशीन का परीक्षण कर रहा है। यह लागू हो जाए तो करोड़ों लोग अपने शहर बदले बिना भी वोट डाल सकेंगे।
4.सार्वजनिक पारदर्शिता-मतदाता सूची को क्षेत्रवार ऑनलाइन उपलब्ध कराना, जिससे नागरिक त्रुटियाँ तुरंत पकड़ कर सुधार करा सकें।
5.राजनीतिक हस्तक्षेप रोकना-चुनाव आयोग को कार्यवाही की अधिक स्वतंत्रता और कानूनी शक्ति दी जानी चाहिए।
मतदाता सूची सुधार नीति भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक कदम है। इससे चुनाव अधिक पारदर्शी हुए, फर्जी वोटिंग पर रोक लगी, नए मतदाताओं को सुविधा मिली, डिजिटल प्रणाली ने प्रक्रिया को सरल बनाया और लोकतंत्र में आम नागरिक का विश्वास मजबूत हुआ। हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, विशेषकर डिजिटल असमानता, प्रवासी कामगारों की समस्या और बीएलओ पर बढ़ता दबाव, लेकिन इनका समाधान भी नीति के साथ-साथ विकसित हो रहा है। एक बात स्पष्ट है, सटीक और अद्यतन मतदाता सूची ही लोकतंत्र की सच्ची नींव है। मतदाता सूची सुधार नीति उसी नींव को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
लेखक
डॉ. चेतन आनंद
(कवि-पत्रकार)
